श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 2: हृदय में भगवान्  »  श्लोक 22

 
श्लोक
यदि प्रयास्यन् नृप पारमेष्ठ्यं
वैहायसानामुत यद् विहारम् ।
अष्टाधिपत्यं गुणसन्निवाये
सहैव गच्छेन्मनसेन्द्रियैश्च ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
यदि—यदि; प्रयास्यन्—इच्छा करने पर; नृप—हे राजा; पारमेष्ठ्यम्—भौतिक जगत का अधिष्ठाता लोक; वैहायसानाम्— वैहायस नामक जीवों का; उत—कहा जाता है; यत्—जो है; विहारम्—भोग का स्थान; अष्ट-आधिपत्यम्—अष्टसिद्धियों का स्वामी; गुण-सन्निवाये—त्रिगुणात्मक जगत में; सह—साथ; एव—निश्चय ही; गच्छेत्—जाना चाहिए; मनसा—मन से; इन्द्रियै:—तथा इन्द्रियों से; च—भी ।.
 
अनुवाद
 
 तथापि, हे राजन्, यदि योगी में अत्यधिक भौतिक भोगों की, यथा सर्वोच्चलोक ब्रह्मलोक जाने की, या अष्ट-सिद्धियाँ प्राप्त करने की, अथवा वैहायसों के साथ बाह्य अन्तरिक्ष में यात्रा करने, या लाखों लोकों में से किसी एक में स्थान प्राप्त करने की इच्छा बनी रहती है, तो उसे भौतिकता में ढले मन तथा इन्द्रियों को अपने साथ-साथ ले जाना होता है।
 
तात्पर्य
 ऊर्ध्व लोकों में अधलोकों की अपेक्षा हजारों-हजार गुना अधिक भौतिक भोग की सुविधाएं हैं। सर्वोच्च लोकों में ब्रह्मलोक, ध्रुवलोक इत्यादि हैं और वे सब महर्लोक के ऊपर हैं। इन लोकों के निवासियों को अष्टसिद्धियाँ प्राप्त हैं। उन्हें योग सीखने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती और वे कण के समान लघु होने की शक्ति (अणिमा सिद्धि) या पंख से भी हल्का होने की शक्ति (लघिमा सिद्धि) प्राप्त कर लेते हैं। उन्हें भारी से भारी होने की (महिमा सिद्धि), कोई आश्चर्यजनक वस्तु उत्पन्न करने या कि इच्छानुसार किसी वस्तु को विनष्ट करने के लिए स्वतन्त्रापूर्वक कार्य करने की (ईशित्व सिद्धि) या सारे तत्त्वों को वश में करने की (वशित्व सिद्धि), किसी भी इच्छा के विफल न होने की शक्ति रखने की (प्राकाम्य सिद्धि) या इच्छानुसार कोई भी रूप धारण करने (कामवसायिता सिद्धि) के लिए, कोई वस्तु किसी स्थान-विशेष से प्राप्त करने की (प्राप्ति सिद्धि) की आवश्यकता नहीं पड़ती। ये सारी सिद्धियाँ उच्च लोक के वासियों को प्राकृतिक उपहार के रूप में मिली होती हैं। उन्हें बाह्य अन्तरिक्ष में विचरण करने के लिए किसी यान्त्रिक सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ती और वे पलक मारते एक लोक से दूसरे लोकों में इच्छानुसार विचरण कर सकते हैं। पृथ्वी के निवासी तो निकटतम लोक तक भी यान्त्रिक यान, यथा अन्तरिक्ष यान के बिना, यात्रा नहीं कर सकते, किन्तु ऐसे उच्चलोकों के प्रतिभा सम्पन्न निवासी सारा काम आसानी से कर लेते हैं।
चूँकि भौतिकतावादी ऐसे लोकों में वास्तव में जो कुछ है उसका अनुभव प्राप्त करने के लिए उत्सुक रहता है, अतएव वह हर वस्तु को स्वयं देखना चाहता है। जैसे उत्सुक व्यक्ति पूरे संसार में घूमकर प्रत्यक्ष स्थानीय अनुभव प्राप्त करना चाहता है, उसी तरह अल्पज्ञ आध्यात्मिक व्यक्ति उन लोकों का कुछ अनुभव प्राप्त करना चाहता है, जिनके विषय में उसने विस्मयपूर्ण बातें सुन रखी हैं। किन्तु योगी अपने मन तथा इन्द्रियों सहित वहाँ जाकर अपनी इच्छा आसानी से पूरी कर सकता है। भौतिकतावादी मस्तिष्क की मूल प्रवृत्ति भौतिक जगत पर प्रभुत्व जताने की है और यहाँ पर वर्णित सारी सिद्धियाँ भौतिक जगत पर प्रभुत्व की द्योतक हैं। भगवद्भक्त इतने महत्त्वाकांक्षी नहीं होते कि मिथ्या तथा क्षणभंगुर घटना पर प्रभुत्व जताना चाहें। इसके विपरित भक्त तो परम अधिष्ठाता भगवान् द्वारा शासित होना चाहते हैं। भगवान् या परम अधिष्ठाता की सेवा करने की इच्छा आध्यात्मिक या दिव्य है और आध्यात्मिक जगत में प्रवेश पाने के लिए मनुष्य को मन तथा इन्द्रियों की यह शुद्धि प्राप्त करनी होती है। भौतिकतावादी मन से मनुष्य ब्रह्माण्ड के सर्वश्रेष्ठ लोक में पहुँच सकता है, लेकिन वह भगवद्धाम में नहीं जा सकता। इन्द्रियतृप्ति में रत न रहने पर इन्द्रियाँ आध्यात्मिक रीति से शुद्ध कहलाती हैं। इन्द्रियाँ कार्यरत रहना चाहती हैं और जब वे ही इन्द्रियाँ भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में पूर्ण रूप से प्रवृत्त रहती हैं, तो वे भौतिक दूषणों से कलुषित नहीं हो पातीं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥