श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 2: हृदय में भगवान्  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक
वैश्वानरं याति विहायसा गत:
सुषुम्णया ब्रह्मपथेन शोचिषा ।
विधूतकल्कोऽथ हरेरुदस्तात्
प्रयाति चक्रं नृप शैशुमारम् ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
वैश्वानरम्—अग्निदेव; याति—जाता है; विहायसा—आकाश मार्ग (आकाश-गंगा) से; गत:—पार करके; सुषुम्णया— सुषुम्णा द्वारा; ब्रह्म—ब्रह्मलोक; पथेन—पथ से; शोचिषा—प्रकाशमान; विधूत—धुला हुआ; कल्क:—धूल, मल; अथ— तत्पश्चात्; हरे:—हरि के; उदस्तात्—ऊपर; प्रयाति—पहुँचता है; चक्रम्—चक्र; नृप—हे राजा; शैशुमारम्—शिशुमार नामक ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, जब योगी सर्वोच्चलोक ब्रह्मलोक पहुँचने के लिए प्रकाशमान सुषुम्णा द्वारा आकाश-गंगा के ऊपर से गुजरता है, तो वह सर्वप्रथम अग्निदेव के लोक वैश्वानर जाता है, जहाँ वह सारे कल्मषों से परि-शुद्ध हो जाता है। तब वह भगवान् से तादात्म के लिए उससे भी ऊपर शिशुमार चक्र को जाता है।
 
तात्पर्य
 ध्रुवतारा तथा उसके आसपास का मंडल शिशुमार चक्र कहलाता है, जहाँ पर भगवान् (क्षीरोदकशायी विष्णु) का निवास-स्थान है। वहाँ तक पहुँचने के पूर्व योगी को आकाश-गंगा के ऊपर से होकर ब्रह्मलोक पहुँचना होता है। वहाँ जाते समय सर्वप्रथम वह वैश्वानर लोक पहुँचता है, जहाँ का देवता अग्नि पर नियंत्रण रखता है। इस वैश्वानर में योगी भौतिक जगत के संसर्ग में रहने के रहने कारण अर्जित समस्त पापों के मल से पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाता है। यहाँ पर आकाश गंगा को सर्वोच्च लोक ब्रह्मलोक को जानेवाले मार्ग के रूप में दिखाया गया है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥