श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 2: हृदय में भगवान्  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
अत: कविर्नामसु यावदर्थ:
स्यादप्रमत्तो व्यवसायबुद्धि: ।
सिद्धेऽन्यथार्थे न यतेत तत्र
परिश्रमं तत्र समीक्षमाण: ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
अत:—इस कारण; कवि:—प्रबुद्ध व्यक्ति; नामसु—केवल नाम के लिए; यावत्—न्यूनतम; अर्थ:—आवश्यकता; स्यात्— होए; अप्रमत्त:—उनके पीछे पागल हुए बिना; व्यवसाय-बुद्धि:—बुद्धिपूर्वक स्थित; सिद्धे—सफलता के लिए; अन्यथा— अन्यथा; अर्थे—के हित में; न—कभी नहीं; यतेत—प्रयास करे; तत्र—वहाँ; परिश्रमम्—कठोर श्रम; तत्र—वहाँ; समीक्षमाण:—व्यावहारिक दृष्टि से देखनेवाला ।.
 
अनुवाद
 
 अतएव प्रबुद्ध व्यक्ति को उपाधियों वाले इस जगत में रहते हुए जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं के लिए प्रयत्न करना चाहिए। उसे बुद्धिमत्तापूर्वक स्थिर रहना चाहिए और अवांछित वस्तुओं के लिए कभी कोई प्रयत्न नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह इससे व्यावहारिक रूप में यह अनुभव करने में सक्षम होता है कि ऐसे सारे प्रयास कठोर श्रम के अतिरिक्त और कुछ नहीं होते।
 
तात्पर्य
 भागवत धर्म या श्रीमद्भागवत की विचारधारा सकाम कर्म के मार्ग से सर्वथा पृथक् है, क्योंकि भक्त ऐसे सकाम कर्मों के मार्ग को समय का अपव्यय मात्र मानते हैं। सारा ब्रह्माण्ड, या यों कहें कि सारा भौतिक जगत, गतिशील है ताकि योजना बनाने के लिए मनुष्य की स्थिति अत्यन्त आरामदेह या सुरक्षित बनी रहे, यद्यपि सभी लोग देखते हैं कि यह संसार न तो आरामदेह है, न सुरक्षित है और विकास की किसी अवस्था में ऐसा हो भी नहीं सकता। जो लोग भौतिक सभ्यता की भ्रामक प्रगति से मोहित हैं, वे निश्चय ही पागल (प्रमत्त) हैं। यह सारी भौतिक सृष्टि केवल नामों की जादूगरी है। वास्तव में यह पृथ्वी, जल, अग्नि जैसे पदार्थों से बनी मोहनेवाली सृष्टि के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। इमारतें, साज-सामान, कारें, बँगले, मिलें, फैक्टरियाँ, उद्योग, शान्ति, युद्ध या परमाणु शक्ति तथा इलेक्ट्रानिक जैसी भौतिक विज्ञान की सर्वोच्च सिद्धियाँ, भौतिक तत्त्वों तथा तीनों गुणों की मिली जुली प्रतिक्रिया के मोहक नाम के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं। चूँकि भगवान् का भक्त इन्हें पूरी तरह जानता रहता है, अतएव वह उन अवास्तविक वस्तुओं को सृजित करने में रुचि नहीं लेता जो समुद्री तरंगों के बुदबुदों के समान नगण्य हैं। बड़े-बड़े राजा, नेता तथा सैनिक एक दूसरे से इसलिए लड़ते हैं जिससे इतिहास में उनके नाम अक्षुण्ण बने रहें, किन्तु वे कालक्रम में भुला दिये जाते हैं और वे इतिहास में एक दूसरे युग को स्थान दे देते हैं। लेकिन भक्त समझता है कि इतिहास तथा ऐतिहासिक व्यक्ति किस तरह क्षणभंगुर समय की उपज हैं। सकाम कर्मी को सम्पत्ति, स्त्री तथा भौतिक मान सम्मान की चाह होती है, किन्तु जिन्हें वास्तविकता का ज्ञान है वे ऐसी मिथ्या वस्तुओं में तनिक भी रुचि नहीं रखते। उनके लिए यह समय का अपव्यय है। चूँकि मनुष्य-जीवन का प्रत्येक क्षण महत्त्वपूर्ण है, अतएव प्रबुद्ध व्यक्ति को समय का उपयोग करने में काफी सतर्क रहना चाहिए। इस जगत में सुख की योजना बनाने की शोध में विनष्ट मानव-जीवन का एक पल भी कभी वापस नहीं मिल सकता, भले ही कोई उसके लिए लाखों स्वर्ण मुद्राएँ क्यों न खर्च करे। अतएव ऐसा अध्यात्मवादी जो माया के चंगुल से छूटना चाहता है, उसे सचेत किया जाता है कि वह सकाम कर्मियों के बाह्य स्वरूप से मोहित न हो। मनुष्य जीवन कभी भी इन्द्रियतप्ति के लिए नहीं बना है, वह तो आत्म-साक्षात्कार के लिए मिला है। श्रीमद्भागवत में आदि से अन्त तक इसी विषय का उपदेश मिलता है। मानव-जीवन मात्र आत्म-साक्षात्कार के लिए है। जो सभ्यता इस सर्वाधिक पूर्णता को लक्ष्य बनाती है, वह अवांछित वस्तुओं मेंं लिप्त नहीं होती और ऐसी पूर्ण सभ्यता मनुष्यों को जीवन की न्यूनतम आवश्यकताएँ स्वीकार करने के लिए या बुरे सौदे का सर्वोत्तम उपयोग करने के सिद्धान्त का पालन करने के लिए तैयार करती है। उस दृष्टि से हमारे भौतिक शरीर तथा हमारे जीवन बुरे सौदे हैं, क्योंकि जीव वास्तव में आत्मा है और जीव की आध्यात्मिक प्रगति अत्यावश्यक है। मानव-जीवन इसी महत्त्वपूर्ण उद्देश्य की प्राप्ति के लिए है, अतएव मनुष्य को जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं को स्वीकार करके भगवान् के उपहार पर आश्रित रहते हुए मानवीय शक्ति को अन्य किसी कार्य में यथा भौतिक भोग के पीछे दीवाना होने में न लगाकर तदनुसार कर्म करना चाहिए। सभ्यता का भौतिकतावादी विकास असुरों की सभ्यता कहलाता है, जिसका अन्त युद्ध तथा अभाव में होता है। यहाँ पर अध्यात्मवादी को मन से स्थिर होने के लिए कहा गया है, जिससे यदि ‘सादा जीवन उच्च विचार’ में कठिनाई का अनुभव भी हो तो वह अपने दृढ़ संकल्प से रंचमात्र भी नहीं डिगे। विश्व के इन्द्रियतृप्तिकर्ताओं के घनिष्ठ सम्पर्क में आना अध्यात्मवादी के लिए आत्मघात है, क्योंकि इस नीति से जीवन का चरम लक्ष्य ही विफल हो जायेगा। शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित से तब मिले जब महाराज को ऐसी भेंट की आवश्यकता थी। अध्यात्मवादी का कर्तव्य है कि असली मुक्तिकामी व्यक्तियों की सहायता करे और मुक्ति के उद्देश्य को सहयोग दे। ध्यान रहे कि शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित से तब कभी नहीं मिले जब वे महान् राजा के रूप में शासन कर रहे थे। अध्यात्मवादी के लिए कार्य-प्रणाली की विवेचना अगले श्लोक में की गई है।
 
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