श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 2: हृदय में भगवान्  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक
न ह्यतोऽन्य: शिव: पन्था विशत: संसृताविह ।
वासुदेवे भगवति भक्तियोगो यतो भवेत् ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
न—कभी नहीं; हि—निश्चय ही; अत:—इसके परे; अन्य:—अन्य कुछ; शिव:—कल्याणप्रद; पन्था:—साधन; विशत:— भटकते हुए; संसृतौ—भौतिक जगत में; इह—इस जीवन में; वासुदेवे—भगवान् वासुदेव कृष्ण में; भगवति—भगवान्; भक्ति- योग:—प्रत्यक्ष भक्ति; यत:—जहाँ; भवेत्—ऐसा हो ।.
 
अनुवाद
 
 जो लोग भौतिक विश्व में भटक रहे हैं, उनके लिए भगवान् कृष्ण की प्रत्यक्ष भक्ति से बढक़र मोक्ष का कोई अधिक कल्याणकर साधन नहीं है।
 
तात्पर्य
 जैसाकि अगले श्लोक से स्पष्ट हो जायेगा, भक्ति या प्रत्यक्ष भक्तियोग ही भवबन्धन से उद्धार का एकमात्र पूर्ण एवं कल्याणप्रद साधन है। भवबन्धन से उद्धार पाने के अनेक अप्रत्यक्ष उपाय हैं, लेकिन इनमें से कोई भी भक्तियोग के समान सरल तथा कल्याणप्रद नहीं है। ज्ञान तथा योग के साधन एवं अन्य सम्बद्ध विधाएँ कर्ता का उद्धार करने के लिए स्वतन्त्र नहीं हैं। ऐसे कार्यों से मनुष्य अनेकानेक वर्षों बाद भक्तियोग की अवस्था को प्राप्त होता है। भगवद्गीता (१२.५) में कहा गया है कि जो लोग ब्रह्म के निर्विशेष स्वरूप के प्रति आसक्त रहते हैं, उन्हें अपने इच्छित लक्ष्य तक पहुँचने में अनेक कष्ट उठाने पड़ते हैं और परम सत्य की खोज करनेवाले ज्ञानी अनेकानेक जन्मों के बाद वासुदेव-अनुभूति की महत्ता को समझ पाते हैं (भगवद्गीता ७.१९)। जहाँ तक योग पद्धति का सम्बन्ध है, भगवद्गीता (६.४७) में यह भी कहा गया है कि योगियों में जो योगी परम सत्य का अनुगमन करता है और जो भगवान् की सेवा में सतत लगा रहता है, वह योगियों में सर्वोच्च है। भगवद्गीता (१८.६६) का अन्तिम उपदेश है कि आत्म-साक्षात्कार तथा भवबन्धन से मोक्ष की विभिन्न विधियों या अन्य सारे कार्यों को छोडक़र भगवान् की शरण में आओ। मनुष्य को सभी प्रकार से भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति स्वीकार करने के लिए प्रेरित करना ही समस्त वैदिक ग्रंथों का तात्पर्य है।

जैसाकि श्रीमद्भागवत के उद्धरणों में (प्रथम स्कन्ध में) बताया जा चुका है, या तो प्रत्यक्ष भक्तियोग या वे सारे साधन ही जिनका पर्यवसान भक्तियोग में होता है, धर्म के सर्वोच्च रूप हैं। इसके अतिरिक्त अन्य सब कुछ कर्ता के समय का अपव्यय मात्र है।

श्रील श्रीधर स्वामी तथा जीव गोस्वामी जैसे अन्य सारे आचार्य यह स्वीकार करते हैं कि भक्तियोग सरल, सहज, प्राकृतिक तथा चिन्तामुक्त होने के साथ ही मानवमात्र के सुख का एकमात्र स्रोत है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥