श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 2: हृदय में भगवान्  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक
भगवान् सर्वभूतेषु लक्षित: स्वात्मना हरि: ।
द‍ृश्यैर्बुद्ध्यादिभिर्द्रष्टा लक्षणैरनुमापकै: ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
भगवान्—भगवान्; सर्व—समस्त; भूतेषु—सारे जीवों में; लक्षित:—देखे जाते हैं; स्व-आत्मना—आत्मा सहित; हरि:— भगवान्; दृश्यै:—देखे जाने के द्वारा; बुद्धि-आदिभि:—बुद्धि के द्वारा; द्रष्टा—देखने वाला; लक्षणै:—विभिन्न लक्षणों से; अनुमापकै:—परिकल्पना द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 आत्मा के साथ भगवान् श्रीकृष्ण प्रत्येक जीव में हैं। यह तथ्य हमारे देखने से तथा बुद्धि से सहायता लेने पर अनुभूत तथा परिकल्पित होता है।
 
तात्पर्य
 जनसामान्य का यह आम तर्क है कि चूँकि भगवान् हमारी आँखों को नहीं दिखते तो फिर कोई किस तरह उनकी शरण में जाय या उनकी दिव्य प्रेमाभक्ति करे? ऐसे जनसामान्य के लिए यहाँ पर श्रील शुकदेव गोस्वामी द्वारा व्यावहारिक सुझाव दिया गया है कि मनुष्य तर्क तथा अनुभूति द्वारा किस तरह परमेश्वर का दर्शन पा सकता है। वास्तव में, भगवान् हमारी वर्तमान भौतिक इन्द्रियों द्वारा देखे नहीं जा सकते, किन्तु जब कोई व्यावहारिक सेवा-भाव से भगवान् की उपस्थिति के बारे में आश्वस्त हो लेता है, तो भगवत्कृपा से उनका प्राकट्य होता है और भगवान् का ऐसा शुद्ध भक्त सदैव तथा प्रत्येक स्थान में भगवान् का दर्शन कर सकता है। वह यह अनुभव कर सकता है कि बुद्धि भगवान् के पूर्ण अंश परमात्मा का रूप-निर्देशन है। सामान्य व्यक्ति के लिए भी यह अनुभव कर सकना कि परमात्मा जन-जन के साथ हैं कठिन नहीं है। इसकी विधि इस प्रकार है—मनुष्य आत्म-पहचान का अनुभव करे और सकारात्मक रूप से ऐसा अनुभव करे कि वह विद्यमान है। उसे यह एकाएक नहीं, अपितु थोड़ी बुद्धि लगाने पर अनुभव होगा कि वह शरीर नहीं है। उसे अनुभव होगा कि हाथ, पाँव, सिर, बाल तथा अंग-प्रत्यंग उसके शरीर के अंश हैं, किन्तु हाथ पाँव, सिर इत्यादि से उसके आत्मस्वरुप की पहचान नहीं हो सकती। अतएव अपनी बुद्धि से वह अपनी आत्मा को अन्य दृश्य वस्तुओं से अन्तर करके, उन्हें विलग कर सकता है। अतएव निष्कर्ष यह निकला कि जीव, चाहे मनुष्य हो या पशु, वह द्रष्टा है और वह अपने अतिरिक्त सबों को देख सकता है। अतएव द्रष्टा तथा दृश्य में अन्तर होता है। अब थोड़ी बुद्धि लगाने पर, हम यह मान सकते हैं कि जो जीव अपने से दूर वस्तुओं को साधारण दृष्टि से देखता है, वह स्वतन्त्र रूप से देख या चल नहीं सकता। हमारे सारे कार्य तथा अनुभूतियाँ उन विभिन्न शक्तियों पर निर्भर हैं, जो हमें प्रकृति द्वारा विभिन्न संयोगों के रूप में प्रदान की जाती हैं। हमारी कर्मेन्द्रियाँ तथा ज्ञानेन्द्रियाँ, हमें प्राकृतिक शक्ति के स्थूल या सूक्ष्म रूपों, में हमें प्राप्त होती हैं। ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं—(१) श्रवण (२) स्पर्श (३) दर्शन (४) स्वाद तथा (५) गंध। इसी तरह कर्मेन्द्रियाँ भी पाँच हैं—(१) हाथ (२) पाँव (३) वाणी (४) मल निकासी अंग; तथा (५) जननेन्द्रियाँ। हमारी तीन सूक्ष्म इन्द्रियाँ इस प्रकार हैं—(१) मन (२) बुद्धि; तथा (३) अहंकार। (कुल मिलाकर तेरह इन्द्रियाँ हैं)। यह भी समान रूप से स्पष्ट है कि हमारे अनुभव के विषय (वस्तुएँ) प्राकृतिक शक्ति के असीम संयोग के प्रतिफल हैं। चूँकि इससे यह सिद्ध हो जाता है कि सामान्य जीव अनुभव या गति के मामले में स्वतन्त्र नहीं है और हमारा अस्तित्व प्रकृति की शक्ति द्वारा प्रतिबन्धित है, अतएव हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि जो देखता है (द्रष्टा), वह आत्मा है तथा हमारी समस्त इन्द्रियाँ एवं अनुभव के विषय भौतिक हैं। द्रष्टा का आध्यात्मिक गुण हमारी भौतिक बद्धावस्था की सीमित स्थिति के साथ हमारे असंतोष द्वारा परिलक्षित होता है। आत्मा तथा पदार्थ का यही अन्तर है। कुछ अल्पज्ञ तर्क करते हैं कि भौतिक पदार्थ से देखने तथा चलने की शक्ति विकसित होती है, किन्तु ऐसा तर्क स्वीकार्य नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा प्रयोगात्मक साक्ष्य प्राप्त नहीं है, जिसमें पदार्थ से कहीं भी जीव उत्पन्न हुआ हो। भविष्य कितना ही आकर्षक क्यों न हो, उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। भौतिक तत्त्वों से आत्मा के विकास की बात व्यर्थ व मूर्खतापूर्ण है, क्योंकि आज तक विश्व में कहीं भी पदार्थ में देखने तथा गति करने की शक्ति विकसित नहीं हुई। अतएव यह निश्चित है कि पदार्थ तथा आत्मा दो पृथक् सत्ताएँ हैं और बुद्धि द्वारा इस निष्कर्ष तक पहुँचा जा सकता है। अब हम इस बात पर आते हैं कि जो वस्तुएँ थोड़ी बुद्धि लगाने पर दिखती हैं, वे चलित नहीं हो सकतीं जब तक कि हम किसी को बुद्धि का प्रयोगकर्ता या निर्देशक स्वीकार न कर लें। बुद्धि उसी प्रकार निर्देश करती है, जिस प्रकार उच्च अधिकारी निर्देश देता है और बुद्धि का प्रयोग किये बिना जीव न तो देख सकता है, न हिल-डुल सकता है, न खा सकता है और न कोई कार्य ही कर सकता है। जब मनुष्य बुद्धि का उपयोग नहीं कर पाता तो वह बेसुध बन जाता है, अतएव जीव बुद्धि पर अथवा किसी श्रेष्ठ व्यक्ति के निर्देशन पर निर्भर रहता है। ऐसी बुद्धि सर्वव्यापी है। प्रत्येक जीव में बुद्धि होती है और यह बुद्धि, किसी श्रेष्ठतर अधिकारी का निर्देशन होने के कारण, उस पिता के तुल्य है, जो अपने पुत्र को मार्गनिर्देश देता रहता है। यह उच्च अधिकारी परमात्मा हैं, जो प्रत्येक जीव में उपस्थित रहकर उसके भीतर वास कर रहा हैं।

अपनी खोज के सिलसिले में यहाँ हम निम्नलिखित प्रश्न पर विचार कर सकते हैं: एक ओर हम यह अनुभव करते हैं कि हमारी सारी अनुभूतियाँ तथा कार्य प्रकृति की व्यवस्था द्वारा नियन्त्रित हैं, तो भी हम ऐसा अनुभव करते हैं और कहते हैं “मैं देख रहा हूँ” या “मैं कर रहा हूँ”। अतएव हम कह सकते हैं कि हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ तथा कर्मेन्द्रियाँ गतिशील हैं, क्योंकि हम अपनी पहचान भौतिक शरीर के रूप में कर रहे हैं और परमात्मा हमारी इच्छानुसार हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं तथा हमारी इच्छा के अनुसार हमें फल दे रहे हैं। बुद्धि के रूप में परमात्मा के मार्गदर्शन का लाभ उठाकर, हम यह अध्ययन करते रहते हैं और अपने निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि, “मैं शरीर नहीं हूँ” या हम झूठी पहचान करते रह सकते हैं और अपने को ही स्वामी तथा कर्ता मानते रह सकते हैं। हमारी स्वतन्त्रता इतनी ही है कि हम अपनी इच्छा को अज्ञान, भौतिक भ्रान्त धारणाओं की ओर, या सही आध्यात्मिक धारणाओं की ओर ले जाँय। हम परमात्मा को अपना मित्र तथा मार्गदर्शक मानकर तथा उसी पर अपनी बुद्धि लगाकर, असली आध्यात्मिक धारणा प्राप्त कर सकते हैं। परमात्मा तथा आत्मा दोनों ही आत्मा हैं, अतएव दोनों के गुण एक से हैं और वे पदार्थ से भिन्न हैं। लेकिन परमात्मा तथा आत्मा समान स्तर पर नहीं हो सकते, क्योंकि परमात्मा निर्देश देता है या बुद्धि प्रदान करता है और आत्मा उस निर्देश का पालन करता है, जिससे सही ढंग से कार्य सम्पन्न होते हैं। व्यक्ति पूर्ण रूप से परमात्मा के निर्देश पर आश्रित रहता है, क्योंकि देखने, सुनने, सोचने, अनुभव करने तथा इच्छा करने इत्यादि में, वह पद-पद पर परमात्मा के निर्देश का पालन करता है।

जहाँ तक सामान्य ज्ञान का प्रश्न है, हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि तीन प्रकार की सत्ताएँ हैं— पदार्थ, आत्मा तथा परमात्मा। अब यदि हम भगवद्गीता या वैदिक ज्ञान में प्रवेश करें, तो हम यह भी समझ सकेंगे कि ये तीनों सत्ताएँ पूर्ण पुरुषोत्तमभगवान् पर आश्रित हैं। परमात्मा तो भगवान् की आंशिक अभिव्यक्ति है। भगवद्गीता पुष्टि करती है कि भगवान् अपनी आंशिक अभिव्यक्ति से ही सारे भौतिक जगत में आधिपत्य बनाए हुए हैं। ईश्वर महान् हैं और वे जीवात्मा के आज्ञापालक मात्र नहीं हो सकते। अतएव परमात्मा पुरुषोत्तम भगवान् की पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं हो सकता। जीवात्मा द्वारा परमात्मा की अनुभूति किया जाना आत्म-साक्षात्कार का शुभारम्भ है और इस आत्म-साक्षात्कार की प्रगति होने से मनुष्य बुद्धि द्वारा, मान्य शास्त्रों द्वारा तथा मुख्यतया भगवत्कृपा द्वारा भगवान् की अनुभूति कर पाने में सक्षम होता है। भगवद्गीता भगवान् श्रीकृष्ण की प्रारम्भिक अव-धारणा है और श्रीमद्भागवत उसके आगे ईश-विज्ञान की व्याख्या है। अतएव यदि हम अपने संकल्प में दृढ़ रहें तथा उसी शरीर-रूपी वृक्ष में आसीन बुद्धि के निर्देशक के कृपा की याचना करें, जो पक्षी रूप में अन्य पक्षी के साथ आसीन है (जैसाकि उपनिषदों में कहा गया है) तो वेदों में दी गई सूचनाएँ हमारे समक्ष स्पष्ट हो जाएँगी और तब भगवान् वासुदेव को समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी। अतएव बुद्धिमान व्यक्ति बुद्धि के ऐसे उपयोग से अनेक जन्मों के बाद भी वासुदेव के चरणकमलों की शरण ग्रहण करता है, जैसाकि भगवद्गीता (७.१९) में पुष्टि हुई है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥