श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 2: हृदय में भगवान्  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
सत्यां क्षितौ किं कशिपो: प्रयासै-
र्बाहौ स्वसिद्धे ह्युपबर्हणै: किम् ।
सत्यञ्जलौ किं पुरुधान्नपात्र्या
दिग्वल्कलादौ सति किं दुकूलै: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
सत्याम्—अधिकार में करके; क्षितौ—पृथ्वी का खंड; किम्—क्या आवश्यकता है; कशिपो:—खाट तथा गद्दों की; प्रयासै:— प्रयास करने से; बाहौ—बाँह के; स्व-सिद्धे—आत्म-निर्भर होने के लिए; हि—निश्चय ही; उपबर्हणै:—गद्दा तथा तकिया से; किम्—क्या लाभ है; सति—उपस्थित होकर; अञ्जलौ—हथेली में; किम्—क्या लाभ है; पुरुधा—व्यंजन, किस्में; अन्न—खाद्य पदार्थों के; पात्र्या—बर्तनों से; दिक्—खुला स्थान; वल्कल-आदौ—वृक्षों की छाल; सति—होने से; किम्—क्या लाभ है; दुकूलै:—वस्त्रों से ।.
 
अनुवाद
 
 जब लेटने के लिए विपुल भूखंड पड़े हैं, तो चारपाइयों तथा गद्दों की क्या आवश्यकता है? जब मनुष्य अपनी बाँह का उपयोग कर सकता है, तो फिर तकिये की क्या आवश्यकता है? जब मनुष्य अपनी हथेलियों का उपयोग कर सकता है, तो तरह-तरह के बर्तनों की क्या आवश्यकता है? जब पर्याप्त ओढऩ अथवा वृक्ष की छाल उपलब्ध हो, तो फिर वस्त्र की क्या आवश्यकता है?
 
तात्पर्य
 शरीर की रक्षा तथा सुविधा के लिए व्यर्थ ही जीवन की आवश्यकताएँ नहीं बढ़ा लेनी चाहिए। ऐसे ही भ्रामक सुख की खोज में मानवशक्ति व्यर्थ नष्ट होती है। यदि मनुष्य फर्श पर लेट सकता है, तो फिर वह लेटने के लिए मुलायम गद्दा पाने के लिए क्यों प्रयत्नशील रहता है? यदि वह बिना तकिये के ही प्रकृति द्वारा प्रदत्त अपनी मुलायम बाहों का उपयोग कर सकता है, तो फिर तकिये की खोज करना व्यर्थ है। यदि हम पशुओं के सामान्य जीवन का अध्ययन करें तो देखेंगे कि उनमें बड़े-बड़े घर, फर्नीचर तथा घर के अन्य साज-सामान बनाने की बुद्धि नहीं है, फिर भी वे खुली भूमि में लेटकर स्वस्थ जीवन बिताते हैं। वे भोजन पकाना नहीं जानते, फिर भी वे मनुष्य की अपेक्षा अधिक सरलता से स्वस्थ जीवन बिताते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि मानव सभ्यता पलट कर पशु-जीवन बिताने लगे या कि मनष्य नंगा होकर जंगलों में विचरण करने लगे और संस्कृति, शिक्षा तथा नैतिकता की विचारधारा से विहीन हो जाय। बुद्धिमान मनुष्य कभी पशु-जीवन नहीं बिता सकता, अपितु मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी बुद्धि का उपयोग कला तथा विज्ञान, कविता तथा दर्शन में करे। इस प्रकार वह मानवीय सभ्यता को आगे बढ़ा सकता है। किन्तु यहाँ पर श्रील शुकदेव गोस्वामी ने जो विचार प्रदान किया है, वह यह है कि मानव-जीवन की आरक्षित शक्ति, जो पशुओं से अधिक श्रेष्ठ है, उसका उपयोग मात्र आत्म-साक्षात्कार के लिए ही किया जाना चाहिए। मानव सभ्यता की प्रगति ईश्वर के प्रति खोये सम्बन्धों की पुन:स्थापना की ओर लक्षित होनी चाहिए, जो मनुष्य जीवन के अतिरिक्त अन्य किसी योनि में सम्भव नहीं है। मनुष्य को भौतिक परिवर्तनशीलता की निरर्थकता का बोध होना चाहिए, इसे मृगमरीचिका सा मानना चाहिए और जीवन के कष्टों का समाधान खोज निकालने का प्रयत्न करना चाहिए। सुधरी पशु-सभ्यता से युक्त आत्म-तृप्ति, जिसका लक्ष्य इन्द्रियतृप्ति हो, भ्रम है और ऐसी सभ्यता सभ्यता कहलाने योग्य नहीं है। ऐसे मिथ्या कर्म करने वाला जीव माया- मोहित है। प्राचीनकाल के सन्त तथा महात्मा कभी अच्छे फर्नीचर से सज्जित एवं तथाकथित जीवन की सुविधाओं से युक्त राजप्रसादों में नहीं रहते थे। वे कुटियों तथा कुंजों में रहा करते थे, भूमि पर बैठते थे; फिर भी वे अपने पीछे उच्च ज्ञान की महान् निधि छोड़ गये हैं। श्रील रूप गोस्वामी तथा श्रील सनातन गोस्वामी राज्य के उच्च-पदासीन मन्त्री थे, लेकिन वे अपने पीछे दिव्य ज्ञान-विषयक प्रभूत ग्रंथ छोड़ गये हैं जबकि वे किसी भी वृक्ष के नीचे केवल एक रात टिकते थे। वे किसी एक वृक्ष के नीचे कभी दो रात भी नहीं रहे, आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित कमरों की बात तो कोसों दूर रही! तो भी उन्होंने हमें अत्यन्त उपादेय आत्म-साक्षात्कार का साहित्य दिया है। प्रगतिशील सभ्यता के लिए तथाकथित जीवन की सुविधाएँ सहायक नहीं बनतीं, अपितु वे ऐसे प्रगतिशील जीवन में बाधक हैं। चार वर्णों तथा चार आश्रमों वाली सनातन-धर्म पद्धति में प्रगतिशील जीवन के सुखमय अन्त के लिए पर्याप्त आदेश हैं और उसमें निष्ठावान अनुयायियों को जीवन का वांछित लक्ष्य प्राप्त करने के लिए स्वेच्छा से संन्यास आश्रम स्वीकार करना होता है। यदि कोई प्रारम्भ से ऐसे संन्यासी तथा आत्मोत्सर्ग जीवन का पालन करने का अभ्यस्त नहीं होता, तो उसे बाद के जीवन में इसका अभ्यास करना चाहिए जैसाकि श्रील शुकदेव गोस्वामी ने संस्तुति की है। इससे वांछित सफलता प्राप्त करने में सहायता मिलेगी।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥