श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 2: हृदय में भगवान्  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक
कस्तां त्वनाद‍ृत्य परानुचिन्ता-
मृते पशूनसतीं नाम कुर्यात् ।
पश्यञ्जनं पतितं वैतरण्यां
स्वकर्मजान् परितापाञ्जुषाणम् ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
क:—और कौन; ताम्—उसको; तु—लेकिन; अनादृत्य—उपेक्षा करके; पर-अनुचिन्ताम्—दिव्य विचार; ऋते—बिना; पशून्—भौतिकतावादी; असतीम्—क्षण-भंगुर; नाम—नाम को; कुर्यात्—स्वीकार करेगा; पश्यन्—निश्चित रूप से देखते हुए; जनम्—जनता, सामान्यजन; पतितम्—पतित; वैतरण्याम्—दुखों की नदी वैतरणी में; स्व-कर्म-जान्—अपने कर्मों से उत्पन्न; परितापान्—दुखों को; जुषाणम्—आक्रान्त ।.
 
अनुवाद
 
 निपट भौतिकतावादी के अतिरिक्त कौन ऐसा होगा जो यह देखकर कि जन-सामान्य अपने कर्मों से मिलने वाले फलों के कारण क्लेशों की नदी में गिरे हुए हैं, ऐसे विचार की उपेक्षा करे और केवल क्षणभंगुर नामों को ग्रहण करे?
 
तात्पर्य
 वेदों में कहा गया है कि जो लोग भगवान् को छोडक़र अन्य देवताओं के प्रति आसक्त रहते हैं, वे उन पशुओं के तुल्य हैं, जो ऐसे व्यक्ति का अनुसरण करते रहते हैं, जो उन्हें कसाई घर की ओर ले जा रहा हो। पशुओं की तरह ये भौतिकतावादी भी यह नहीं जानते कि वे परम पुरुष के दिव्य विचार की उपेक्षा के कारण कुमार्ग पर जा रहे हैं। कोई विचारशून्य नहीं रह सकता। कहा गया है कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है, क्योंकि जो व्यक्ति सही दिशा में नहीं सोच सकता, वह ऐसे विषय में सोचेगा जिससे विपत्ति आ खड़ी हो। भौतिकतावादी लोग नित्य ही किन्हीं छोटे-मोटे देवताओं की पूजा करते रहते हैं, यद्यपि भगवद्गीता (७.२०) में इसकी भर्त्सना की गई है। जब तक मनुष्य भौतिक लाभ के द्वारा मोहग्रस्त होता रहता है, तब तक वह उन-उन देवताओं से किसी न किसी विशेष लाभ की याचना करता रहता है, जो अन्ततोगत्वा भ्रामक तथा क्षणभंगुर होते हैं। किन्तु प्रबुद्ध अध्यात्मवादी कभी ऐसी भ्रामक वस्तुओं से मोहित नहीं होता। अतएव वह परमेश्वर के साक्षात्कार की विभिन्न अवस्थाओं में—यथा ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् के विचार में—लीन रहता है। पिछले श्लोक में यह सुझाया गया है कि मनुष्य को परमात्मा के विषय में चिन्तन करना चाहिए जो ब्रह्म के निराकार विचार से एक पग आगे है, जिस प्रकार कि भगवान् के विराट-रूप के विषय में सुझाया गया था।

बुद्धिमान व्यक्ति उन जीवों की सामान्य दशाओं को ठीक से देख सकते हैं, जो चौरासी लाख योनियों में तथा मनुष्यों की विभिन्न प्रजातियों में भटकते रहते हैं। कहा जाता है कि यमराज के लोक के द्वार पर वैतरणी नामक निरन्तर प्रवाहित रहनेवाली नदी है। यमराज पापियों को विभिन्न प्रकार से दण्ड देते हैं। ऐसी यातना देने के बाद पाप करनेवाले को उसके पूर्व-कर्मों के अनुसार कोई जीव योनि प्रदान की जाती है। यमराज द्वारा दण्डित ऐसे जीव बद्धजीवन की विभिन्न योनियों में देखे जाते हैं। इनमें से कुछ स्वर्ग में रहते हैं, तो कुछ नरक में रहते हैं। इनमें से कुछ ब्राह्मण होते हैं, तो कुछ कंजूस। किन्तु इनमें से कोई भी इस संसार में सुखी नहीं रहता। वे सभी प्रथम, द्वितीय या तृतीय श्रेणी के कैदी बनकर अपने-अपने कर्मों के कारण कष्ट भोगते हैं। भगवान् जीवों के कष्टों की समस्त परिस्थितियों के प्रति निरपेक्ष बने रहते हैं, किन्तु जो उनके चरणकमलों की शरण ग्रहण करते हैं, उन्हें वे समुचित सुरक्षा प्रदान करते हैं और ऐसे जीवों को अपने धाम वापस ले जाते हैं।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥