श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 3: शुद्ध भक्ति-मय सेवा : हृदय-परिवर्तन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.3.12 
ज्ञानं यदाप्रतिनिवृत्तगुणोर्मिचक्र -
मात्मप्रसाद उत यत्र गुणेष्वसङ्ग: ।
कैवल्यसम्मतपथस्त्वथ भक्तियोग:
को निर्वृतो हरिकथासु रतिं न कुर्यात् ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
ज्ञानम्—ज्ञान; यत्—जो; आ—की सीमा तक; प्रतिनिवृत्त—पूर्णतया निवृत्त; गुण-ऊर्मि—भौतिक गुणों की तरंगें; चक्रम्— भँवर; आत्म-प्रसाद:—आत्म-संतोष; उत—और भी; यत्र—जहाँ; गुणेषु—प्रकृति के गुणों में; असङ्ग:—अनासक्ति; कैवल्य— दिव्य; सम्मत—स्वीकृत; पथ:—पथ, रास्ता; तु—लेकिन; अथ—अतएव; भक्ति-योग:—भक्ति; क:—कौन; निर्वृत:—लीन; हरि-कथासु—भगवान् की दिव्य कथाओं में; रतिम्—आकर्षण; न—नहीं; कुर्यात्—करेंगे ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् हरि विषयक दिव्य ज्ञान वह ज्ञान है, जिससे भौतिक गुणों की तरंगें तथा भँवरें पूरी तरह थम जाती हैं। ऐसा ज्ञान भौतिक आसक्ति से रहित होने के कारण आत्मतुष्टि प्रदान करनेवाला है और दिव्य होने के कारण महापुरुषों द्वारा मान्य है। तो भला ऐसा कौन है, जो इससे आकृष्ट नहीं होगा?
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (१०.९) के अनुसार, शुद्ध भक्त के लक्षण अत्यन्त अद्भुत हैं। शुद्ध भक्त अपने सभी कार्यों को सदा भगवान् की सेवा में लगाता है। इस प्रकार शुद्ध भक्त आह्लाद की भावनाओं का परस्पर विनिमय और दिव्य आनन्द का आस्वादन करते हैं। यदि किसी प्रामाणिक गुरु के मार्गदर्शन में उचित ढंग से साधना की जाय तो साधन-अवस्था में भी यह दिव्य आनन्द अनुभव किया जाता है। परिपक्व अवस्था में इस विकसित दिव्य भाव की परिणति भगवान् के साथ विशेष सम्बन्ध की अनुभूति में होती है, जिस के द्वारा जीवात्मा का भौतिक स्वभाव बना होता है (भगवान् के साथ माधुर्य प्रेम तक, जो सर्वोच्च दिव्य आनन्द माना गया है)। इसलिए ईश-साक्षात्कार का एकमात्र साधन होने के कारण भक्तियोग कैवल्य कहलाता है। इस सन्दर्भ में श्रील जीव गोस्वामी एक वैदिक कथन उद्धृत करते हैं (एको नारायणो देव: परावराणां परम आस्ते कैवल्य-संज्ञित:) और यह प्रतिपारित करते हैं कि भगवान् नारायण ही कैवल्य हैं और जिस साधन से मनुष्य भगवान् तक पहुँचता है, वह कैवल्यपन्था अर्थात् भगवान तक पहुँचने का एकमात्र साधन कहा जाता है। कैवल्यपन्था भगवान्-सम्बन्धी कथाओं के श्रवण से प्रारम्भ होता है और ऐसी हरिकथा सुनने का स्वाभाविक परिणाम दिव्य ज्ञान का लाभ है, जिससे संसारी कथाओं से विरक्ति उत्पन्न होती है और विषयों के लिए भक्त में कोई रुचि नहीं रह जाती। भक्त के लिए सारे कार्यकलाप, चाहे वे सामाजिक हों या राजनीतिक, अनाकर्षक प्रतीत होते हैं और परिपक्व अवस्था में ऐसे भक्त को अपने शरीर तक से अरुचि हो जाती है, शारीरिक सम्बन्धियों की बात तो उठती ही नहीं। ऐसी दशा में वह भौतिक गुणों की तरंगों से विचलित नहीं होता। प्रकृति के विभिन्न गुण हैं और जिन कार्यों में सामान्य व्यक्ति अत्यधिक रुचि लेता है या भाग लेता है, वे भक्त के लिए अनाकर्षक होते हैं। यहाँ पर इस अवस्था को प्रतिनिवृत्त-गुणोर्मि कहा गया है और यह आत्म-प्रसाद अर्थात् किसी प्रकार के भौतिक सम्बन्ध के बिना आत्मतुष्टि द्वारा सम्भव है। प्रथम कोटि का भगवद्-भक्त (महाभागवत) भक्ति द्वारा इस अवस्था को प्राप्त होता है, किन्तु अपनी महानता के बावजूद, वह भगवान् की तुष्टि के लिए भगवान् की महिमा का उपदेशक बन सकता है और वह इसी भक्ति में अपने सांसारिक स्वार्थ तक को लगा देता है, जिससे नवदीक्षित भक्तों को अपने सांसारिक स्वार्थों को दिव्य आनन्द में परिणत करने का अवसर मिल सके। श्रील रूप गोस्वामी ने शुद्ध भक्त के इस कार्य को निर्बन्ध: कृष्ण-सम्बन्धे युक्तं वैराग्यमुच्यते कहा है। यदि सांसारिक कार्यों को भगवद्भक्ति से जोड़ दिया जाय, तो वे भी दिव्य या प्रमाणित कैवल्य कार्य बन जाते हैं।
 
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