श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 3: शुद्ध भक्ति-मय सेवा : हृदय-परिवर्तन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
धर्मार्थ उत्तमश्लोकं तन्तु: तन्वन् पितृन् यजेत् ।
रक्षाकाम: पुण्यजनानोजस्कामो मरुद्गणान् ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
धर्म-अर्थ:—आध्यात्मिक विकास के लिए; उत्तम-श्लोकम्—परमेश्वर या उनके प्रति आसक्त व्यक्तियों को; तन्तु:—सन्तान के लिए; तन्वन्—तथा उनकी सुरक्षा के लिए; पितृन्—पितृलोक के वासियों को; यजेत्—पूजे; रक्षा-काम:—सुरक्षा चाहनेवाला; पुण्य-जनान्—पवित्र व्यक्तियों को; ओज:-काम:—शक्ति चाहनेवाला; मरुत्-गणान्—देवताओं को ।.
 
अनुवाद
 
 ज्ञान के आध्यात्मिक विकास के लिए मनुष्य को चाहिए कि भगवान् विष्णु या उनके भक्त की पूजा करे और वंश की रक्षा के लिए तथा कुल की उन्नति के लिए उसे विभिन्न देवताओं की पूजा करनी चाहिए।
 
तात्पर्य
 धर्म-पथ आध्यात्मिक विकास के पथ पर उन्नति करने, अन्ततोगत्वा भगवान् विष्णु के साथ उनके निर्विशेष तेज, उनके अन्तर्यामी परमात्मा-स्वरूप तथा अन्ततोगत्वा ज्ञान में आध्यात्मिक विकास के द्वारा उनके साकार स्वरूप के साथ नित्य सम्बन्ध को पुन:जागरित करने की ओर ले जाता है। जो व्यक्ति अच्छा वंश स्थापित करना चाहता है और क्षणिक शारीरिक सम्बन्धों की उन्नति से सुखी रहना चाहता है, उसे पितरों तथा अन्य पवित्र लोकों के देवताओं की शरण में जाना चाहिए। ऐसे विभिन्न देवताओं की भिन्न-भिन्न श्रेणियों के पूजक अन्ततोगत्वा उन-उन देवताओं के लोकों में पहुँच ही सकेंगे, किन्तु जो ब्रह्मज्योति में स्थित वैकुण्ठ लोकों तक पहुँच जाता है, उसे सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त होती है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥