श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 4: सृष्टि का प्रक्रम  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
सूत उवाच
इत्युपामन्त्रितो राज्ञा गुणानुकथने हरे: ।
हृषीकेशमनुस्मृत्य प्रतिवक्तुं प्रचक्रमे ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
सूत: उवाच—सूत गोस्वामी ने कहा; इति—इस प्रकार; उपामन्त्रित:—अनुरोध किये जाने पर; राज्ञा—राजा द्वारा; गुण- अनुकथने—दिव्य गुणों के वर्णन में; हरे:—भगवान् के; हृषीकेशम्—इन्द्रियों के स्वामी को; अनुस्मृत्य—ठीक से स्मरण करके; प्रतिवक्तुम्—उत्तर देने के लिए; प्रचक्रमे—औपचारकिताएँ पूरी कीं ।.
 
अनुवाद
 
 सूत गोस्वामी ने कहा : जब राजा ने शुकदेव गोस्वामी से इस प्रकार प्रार्थना की कि वे भगवान् की सृजनात्मक शक्ति का वर्णन करें, तो उन्होंने इन्द्रियों के स्वामी (श्रीकृष्ण) का ठीक से स्मरण किया और उपयुक्त उत्तर देने के लिए इस प्रकार बोले।
 
तात्पर्य
 भगवद्भक्तों को जब कोई व्याख्यान देना होता है तथा भगवान् के दिव्य गुणों का वर्णन करना होता है, तो वे यह नहीं सोचते कि वे कोई भी बात स्वतन्त्र रूप से कर सकते हैं। वे सोचते है कि वे तभी ऐसा कर सकते है जब इन्द्रियों के स्वामी भगवान् उन्हें बोलने की प्रेरणा न दें। जीव की इन्द्रियाँ उसकी नहीं होतीं; भक्तगण जानते हैं कि ऐसी इन्द्रियाँ परमेश्वर की हैं और उनका समुचित प्रयोग तभी हो सकता है, जब उनका उपयोग भगवान् की सेवा में किया जाय। इन्द्रियाँ तो यन्त्र हैं और तत्त्व अवयव हैं, जो भगवान् द्वारा प्रदत्त हैं, अतएव मनुष्य जो भी करता, बोलता, देखता है, वह केवल भगवान् के निर्देश पर करता है। भगवद्गीता (१५.१५) इसकी पुष्टि करती है: सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च। कोई भी स्वतन्त्र भाव से कर्म करने के लिए मुक्त नहीं हैं, अतएव मनुष्य को सदा कर्म करने, खाने या बोलने की अनुमति भगवान् से ले लेनी चाहिए और भगवान् के आशीर्वाद से भक्त जो कुछ करता है, वह बद्धजीव द्वारा किये गये चार प्रकार के दोषों के सिद्धान्तों से मुक्त होता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥