श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 4: सृष्टि का प्रक्रम  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
यत्कीर्तनं यत्स्मरणं यदीक्षणं
यद्वन्दनं यच्छ्रवणं यदर्हणम् ।
लोकस्य सद्यो विधुनोति कल्मषं
तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नम: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जिसका; कीर्तनम्—महिमागान; यत्—जिसका; स्मरणम्—स्मरण; यत्—जिसका; ईक्षणम्—दर्शन्; यत्—जिसका; वन्दनम्—प्रार्थना; यत्—जिसका; श्रवणम्—श्रवण; यत्—जिसका; अर्हणम्—पूजा; लोकस्य—लोगों का; सद्य:—तुरन्त; विधुनोति—विशेष रूप से स्वच्छ करता है; कल्मषम्—पापों के प्रभावों को; तस्मै—उसको; सुभद्र—मंगलमय; श्रवसे— श्रवण किया गया; नम:—नमस्कार; नम:—पुन: पुन: ।.
 
अनुवाद
 
 मैं उन सर्वमंगलमय भगवान् श्रीकृष्ण को सादर नमस्कार करता हूँ जिनके यशोगान, स्मरण, दर्शन, वन्दन, श्रवण तथा पूजन से पाप करनेवाले के सारे पाप-फल तुरन्त धुल जाते हैं।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर सर्वोच्च अधिकारी श्री शुकदेव गोस्वामी द्वारा समस्त पापों के फलों (कल्मषों) से मुक्त होने के लिए भव्य धार्मिक कृत्यों का सुझाव रखा दिया है। कीर्तन अर्थात् यशोगान कई प्रकार से सम्पन्न किया जा सकता है—यथा स्मरण करने, देवदर्शन के लिए मन्दिरों में जाने, भगवान् के समक्ष प्रार्थना करने तथा श्रीमद्भागवत या भगवद्गीता में वर्णित विधि से भगवान् की महिमा का पाठ सुनने से। मुधर संगीत के साथ भगवान् के यश का गायन करके तथा श्रीमद्भागवत या भगवद्गीता जैसे शास्त्रों का पाठ करके कीर्तन सम्पन्न किया जा सकता है।

भक्तों को चाहिए कि वे भगवान् की सदेह अनुपस्थिति से निराश न हों, भले ही वे अपने को उनकी संगति में न पा रहे हों। कीर्तन, श्रवण, स्मरण आदि (या तो सभी या इनमें से कुछ या केवल एक) की भक्ति-विधि हमें उपयुक्त प्रकार से भगवान् की दिव्य प्रेमा-भक्ति सम्पन्न करके उनके सान्निध्य का वांछित फल प्रदान कर सकती है। यहाँ तक कि कृष्ण या राम के नाम के उच्चारण मात्र से वायुमण्डल आध्यात्मिक हो उठता है। हमें भलीभाँति जान लेना चाहिए कि जहाँ भी ऐसी शुद्ध दिव्य सेवा की जाती है, वहाँ भगवान् विद्यमान रहते हैं। इस प्रकार निरपराध कीर्तनम् सम्पन्न करनेवाले को भगवान् का सकारात्मक सान्निध्य प्राप्त होता है। इसी प्रकार कुशल मार्गदर्शन के अन्तर्गत सम्पन्न स्मरण तथा वन्दन से भी वांछित फल प्राप्त हो सकता है। मनुष्य को चाहिए कि भक्ति के स्वरूपों को मनमाना नहीं गढ़े। वह किसी मन्दिर में जाकर भगवान् के स्वरूप की पूजा कर सकता है या किसी मस्जिद या गिरजाघर में भगवान् की निर्विशेष भक्तिमयी प्रार्थना कर सकता है। मनुष्य निश्चय ही पाप-

फलों से छूट सकता है बशर्ते कि वह मन्दिर, मस्जिद या गिरजाघर में पूजा करके पापों के फलों से मुक्त होने की आशा से जानबूझकर पाप न करने के बारे में सावधान रहे। भक्तिमय सेवा के बल पर जानबूझकर पाप करने की यह मनोवृत्ति नाम्नो बलाद् यस्य हि पापबुद्धि: कहलाती है और भक्ति के मार्ग में यह सबसे बड़ा अपराध है। अतएव ऐसे पापगर्तों से सावधान रहने के लिए श्रवण अत्यन्त आवश्यक है। इस श्रवण विधि पर विशेष बल देने के उद्देश्य से ही शुकदेव गोस्वामी समस्त कल्याण का आह्वान करते हैं।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥