श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 4: सृष्टि का प्रक्रम  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक
किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कशा
आभीरशुम्भा यवना: खसादय: ।
येऽन्ये च पापा यदपाश्रयाश्रया:
शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नम: ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
किरात—प्राचीन भारत का एक प्रान्त; हूण—जर्मनी तथा रूस का एक अंग; आन्ध्र—दक्षिणी भारत का प्रान्त; पुलिन्द—ग्रीक; पुल्कशा:—अन्य प्रान्त; आभीर—प्राचीन सिंध का एक भाग; शुम्भा:—अन्य प्रान्त; यवना:—तुर्क; खस-आदय:—मंगोल का प्रान्त; ये—वे भी; अन्ये—अन्य; च—भी; पापा:—पाप में प्रवृत्त रहनेवाले; यत्—जिसका; अपाश्रय-आश्रया:—भगवद्भक्तों की शरण ग्रहण करके; शुध्यन्ति—तुरन्त शुद्ध हो जाते हैं; तस्मै—उस; प्रभविष्णवे—शक्तिमान विष्णु को; नम:—मेरा सादर नमस्कार ।.
 
अनुवाद
 
 किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कश, आभीर, शुम्भ, यवन, खस आदि जातियों के सदस्य तथा अन्य लोग, जो पाप कर्मों में लिप्त रहते हुए परम शक्तिशाली भगवान् के भक्तों की शरण ग्रहण करके शुद्ध हो सकते हैं, मैं उन भगवान् को सादर नमस्कार करता हूँ।
 
तात्पर्य
 किरात—यह प्राचीन भारतवर्ष का एक प्रान्त था जिसका उल्लेख महाभारत के ‘भीष्मपर्व’ में हुआ है। सामान्यतया, किरात भारत के आदिवासियों के रूप में विख्यात हैं और आजकल के बिहार तथा छोटा नागपुर के सन्ताल परगने किरात नामक प्राचीन प्रान्त कहलाते थे।

हूण—पूर्वी जर्मनी का क्षेत्र तथा रूस का एक भाग हूण प्रान्त कहलाते हैं। तदनुसार कभी-कभी पर्वतीय आदिवासी जाति हूण कहलाती है।

आन्ध्र—यह दक्षिण भारत का एक प्रान्त था जिसका उल्लेख महाभारत के भीष्मपर्व में मिलता है। यह आज भी इसी नाम से प्रसिद्ध है।

पुलिन्द—इसका उल्लेख महाभारत (आदि पर्व १७४.३८) में पुलिन्द नामक प्रान्त के निवासियों के लिए हुआ है। भीमसेन तथा सहदेव ने इस देश को जीता था। ग्रीसवासी पुलिन्द कहलाते हैं और महाभारत के वन-पर्व में उल्लेख हुआ है कि इस भू भाग की अवैदिक जाति संसार के ऊपर राज्य करेगी। यह पुलिन्द प्रान्त भारत के प्रान्तों में से था और इसके वासियों की गणना क्षत्रिय राजाओं में की जाती थी। किन्तु बाद में, ब्राह्मण संस्कृति का परित्याग कर देने के कारण, उन्हें म्लेच्छ कहा गया (जिस प्रकार इस्लामी संस्कृति को न माननेवाले काफिर कहलाते हैं और जो क्रिस्तानी संस्कृति के अनुयायी नहीं हैं, वे ‘हीदन्स’ कहलाते हैं)।

आभीर—यह नाम महाभारत के सभा-पर्व तथा भीष्म-पर्व दोनों में ही आता है। यह उल्लेख मिलता है कि यह प्रान्त सिंध प्रदेश में सरस्वती नदी के तट पर स्थित था। आधुनिक सिंध प्रान्त पहले अरब सागर के दूसरी ओर भी फैला हुआ था और इस प्रान्त के सारे निवासी आभीर कहलाते थे। ये सब महाराज युधिष्ठिर के अधीन थे और मार्कण्डेय पुराण के अनुसार इस भू भाग के म्लेच्छ भारत पर भी शासन करेंगे। आगे चलकर यह सही साबित हुआ, जैसाकि पुलिन्दों के साथ हुआ। पुलिन्दों की ओर से सिकन्दर महान् ने भारत को जीता और आभीरों की ओर से मुहम्मद गोरी ने भारत जीता। ये आभीरगण पहले ब्राह्मण-संस्कृति के अन्तर्गत क्षत्रिय थे, किन्तु बाद में उन्होंने सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया। जो क्षत्रिय परशुराम से भयभीत होकर काकेशस के पर्वतीय भागों में छिप गये थे बाद में वे ही आभीर कहलाये और जिस स्थान में वे बस गये, वह आभीर देश कहलाया।

शुम्भ या कंक—ये प्राचीन भारत के कंक प्रान्त के निवासी थे जिनका उल्लेख महाभारत में हुआ है।

यवनगण—महाराज ययाति के पुत्र का नाम यवन था जिसे तुर्की नामक भू भाग पर शासन चलाने का भार सौंपा गया। अतएव तुर्क यवन हैं क्योंकि वे महाराज यवन के वंशज हैं। इसलिए यवन लोग क्षत्रिय थे, जो कालान्तर में अपनी ब्राह्मण संस्कृति त्याग कर म्लेच्छ यवन बन गये। यवनों के वर्णन महाभारत (आदि पर्व ८५.३४) में मिलते हैं। तुर्वसु नामक एक अन्य राजा भी यवन कहलाता था। पाण्डवों में से सहदेव ने उसके देश को जीता। पश्चिमी यवन कर्ण के दबाव से कुरुक्षेत्र के युद्ध में दुर्योधन के साथ सम्मिलित हो गये। यह भविष्यवाणी की गई थी कि यवन लोग भारत को जीत लेंगे और यह खरी उतरी।

खस—खस देश के निवासियों का उल्लेख महाभारत (द्रोण पर्व) में हुआ है। जिनके ऊपरी होठ पर ठिगने केश (मूँछ) उगते हैं, वे सामान्यतया खस कहलाते हैं। फलस्वरूप मंगोल, चीनी तथा अन्य लोग खस हैं।

उपर्युक्त ऐतिहासिक नाम विश्व के विभिन्न राष्ट्रों के नाम हैं। निरन्तर पाप कर्म करते रहनेवाले व्यक्ति भी तो सुधरने पर पूर्ण मनुष्य के स्तर को प्राप्त होते हैं, यदि वे भगवद्भक्त की शरण ग्रहण कर लें। जीसस क्राइस्ट तथा मुहम्मद—इन दो शक्तिशाली भगवद्भक्तों ने इस भू-मंडल में भगवान् की ओर से अपार सेवाएँ की हैं। श्रील शुकदेव गोस्वामी के कथन से प्रतीत होता है कि विश्व की वर्तमान परिस्थिति में ईश्वरविहीन सभ्यता चलाने से अच्छा तो यह होगा कि संसार के मामलों का नेतृत्व भगवद्भक्तों को सौंप दिया जाय जिसके लिए पहले से कृष्णभावनामृत नामक अन्तर्राष्ट्रीय संघ चल रहा है। तब भगवत्कृपा से सारे विश्व के मनुष्यों के हृदयों में परिवर्तन हो सकेगा, क्योंकि भगवद्भक्त सामान्य लोगों के धूलधूसरित मनों को शुद्ध करके ऐसा परिवर्तन ला सकने में सक्षम हैं। संसार के राजनीतिज्ञ अपने-अपने स्थानों में बने रहेंगे, क्योंकि भगवद्भक्तों को नेतृत्व या राजनायिक उलझन में कोई रुचि नहीं रहती। भक्तों को केवल इतनी ही रुचि रहती है कि सामान्य जन राजनीतिक प्रचार से दिग्भ्रमित न हों, लोग ऐसी सभ्यता का अनुसरण करके बिगड़ न जाँय जो अन्ततोगत्वा विनाश की ओर ले जानेवाली हो। अतएव, यदि राजनीतिज्ञ लोग भक्तों से मार्गदर्शन प्राप्त करें तो निश्चय ही भक्तों के शुद्धिकरण आन्दोलन से विश्व की परिस्थिति में महान् परिवर्तन आयेगा जैसाकि भगवान् चैतन्य ने कर दिखाया है। जिस प्रकार शुकदेव गोस्वामी ने अपनी स्तुति यत् कीर्तनम् शब्द से प्रारम्भ की है उसी तरह भगवान् चैतन्य ने भी संस्तुति की कि केवल भगवान् के पवित्र नाम के यशोगान से हृदयों में महान् परिवर्तन आयेगा जिससे राजनीतिज्ञों द्वारा मानवीय राष्ट्रों के बीच जो मनोमालिन्य उत्पन्न हुआ है, वह तुरन्त मिट सकेगा। भ्रम की अग्नि बुझ जाने पर दूसरे लाभ भी मिलने लगेंगे। हमरा लक्ष्य भगवद्धाम वापस जाने का है, जिसका उल्लेख हम पिछले पृष्ठों में अनेक बार कर चुके हैं।

भक्ति-सम्प्रदाय के अनुसार, जिसे सामान्तया वैष्णव सम्प्रदाय कहा जाता है, ईश-साक्षात्कार के विषय में किसी के भी अग्रसर होने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। वैष्णव इतना शक्तिसम्पन्न होता है कि वह किरात इत्यादि को भी वैष्णव बना लेता है, जैसाकि ऊपर कहा जा चुका है। भगवद्गीता (९.३२) में भगवान् ने कहा है कि भगवद्भक्त होने में कोई प्रतिबन्ध नहीं है (यहाँ तक कि निम्न कुल में उत्पन्न व्यक्तियों अथवा स्त्रियों, शूद्रों या वैश्यों पर भी) और भगवद्भक्त होने पर प्रत्येक व्यक्ति भगवद्धाम जाने का भागी बन जाता है। इसके लिए एकमात्र योग्यता यह है कि ऐसे भगवद्भक्त की शरण लेनी चाहिए जिसे कृष्ण के दिव्य विज्ञान (भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत) का सम्यक् ज्ञान हो। विश्व के किसी भी भाग का व्यक्ति, जो कृष्ण विज्ञान से अवगत है, शुद्ध भक्त बन सकता है और सामान्य लोगों का गुरु बन कर उनके हृदयों को शुद्ध करके उनका उद्धार कर सकता है। कोई कितना ही बड़ा पापी क्यों न हो, शुद्ध वैष्णव के सम्पर्क से वह तुरन्त शुद्ध हो जाता है। अतएव कोई वैष्णव, विश्व के किसी भी भाग से, जाति-पाँति का विचार किये बिना शिष्य बना सकता है और विधि-विधानों द्वारा उसे शुद्ध वैष्णव का पद दिला सकता है, जो ब्राह्मण संस्कृति से परे है। वर्णाश्रम-धर्म की सत्ता अब इस प्रणाली के तथाकथित अनुयायियों में भी नहीं रह गयी है। न ही वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक उथल-पुथल के सन्दर्भ में वर्णाश्रम धर्म की पुन:स्थापना कर पाना सम्भव है। किसी भी देश के किसी विशेष रीति-रिवाज का ध्यान रखे बिना आध्यात्मिक दृष्टि से, किसी को वैष्णव-सम्प्रदाय में स्वीकार किया जा सकता है और इस दिव्य विधि में कोई बाधा नहीं है। अतएव भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेश से श्रीमद्भागवत या भगवद्गीता सम्प्रदाय का सारे विश्व में प्रचार किया जा सकता है और जो इस दिव्य सम्प्रदाय को स्वीकार करने के इच्छुक हों, उनका उद्धार हो सकता है। भक्तों के इस प्रकार के आन्दोलन को ऐसे सारे लोग स्वीकार करेंगे जो विवेकपूर्ण तथा जिज्ञासु हैं और जो किसी देश की रीति-रिवाज के प्रति द्वेष नहीं रखते। एक वैष्णव दूसरे वैष्णव को जन्म-अधिकार के आधार पर स्वीकार नहीं करता, जिस तरह कि वह मंदिर में स्थित भगवान् के श्रीविग्रह को कभी मूर्ति नहीं मानता। इस सम्बन्ध में सारे संशयों को दूर करने के लिए श्रील शुकदेव गोस्वामी ने सर्वशक्तिमान के आशीर्वाद की कामना की है (प्रभविष्णवे नम:)। जिस प्रकार सर्व-शक्तिमान भगवान् मन्दिर में पूजनीय अपने विग्रह के रूप में अर्चन के भक्तिमय कार्यकलापों के अन्तर्गत अपने भक्त की तुच्छ सेवाएँ ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार जब शुद्ध वैष्णव भगवान् की सेवा में अपने को अर्पित कर देता है और योग्य वैष्णव द्वारा प्रशिक्षित किया जाता है, तो उसका शरीर तुरन्त ही दिव्य बन जाता है। इस प्रसंग में वैष्णव नियम का आदेश है—अर्च्ये विष्णौ शिलाधीर्गुरुषु नरमतिर्वैष्णवे जातिबुद्धि: श्रीविष्णोर्नाम्नि शब्दसामान्यबुद्धि:—मनुष्य को चाहिए कि मन्दिर में पूजित भगवान् के श्रीविग्रह को न तो मूर्ति समझे, न वैध गुरु को सामान्य पुरुष समझे; न ही शुद्ध वैष्णव को किसी जाति से सम्बन्धित माने (पद्म-पुराण)।

निष्कर्ष यह निकला कि सर्वशक्तिमान होने के कारण भगवान् किसी भी परिस्थिति में विश्व के किसी भी व्यक्ति को, चाहे स्वयं या गुरु रूप में, अपनी प्रामाणिक अभिव्यक्ति द्वारा स्वीकार कर सकते हैं। भगवान् चैतन्य ने वर्णाश्रम धर्म के अतिरिक्त अन्य जातियों के अनेक भक्तों को स्वीकार किया और हम सबों को शिक्षा देने के लिए यह घोषित किया कि वे स्वयं किसी जाति या वर्ण के नहीं हैं, अपितु वे वृन्दावन की गोपियों के पालनकर्ता भगवान् (कृष्ण) के दासों के दास हैं। यही आत्म-साक्षात्कार की विधि है।

 
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