श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 4: सृष्टि का प्रक्रम  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक
आत्मजायासुतागारपशुद्रविणबन्धुषु ।
राज्ये चाविकले नित्यं विरूढां ममतां जहौ ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
आत्म—शरीर; जाया—पत्नी; सुत—पुत्र; आगार—महल; पशु—हाथी घोड़े; द्रविण—खजाना; बन्धुषु—मित्रों तथा सम्बन्धियों में; राज्ये—राज्य में; च—भी; अविकले—अविचल, निष्कंटक; नित्यम्—निरन्तर; विरूढाम्—गहरी; ममताम्— ममता, लगाव; जहौ—त्याग दिया ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् कृष्ण के प्रति एकनिष्ठ आकर्षण के फलस्वरूप महाराज परीक्षित ने अपने निजी शरीर, अपनी पत्नी, अपनी सन्तान, अपने महल, अपने पशु, हाथी-घोड़े, अपने खजाने, मित्र तथा सम्बन्धी और अपने निष्कंटक राज्य के प्रति प्रगाढ़ ममता त्याग दी।
 
तात्पर्य
 मुक्त होने का अर्थ है देहात्मबुद्धि से स्वतन्त्र होना, जो निजी शारीरिक आवरणों तथा शरीर से सम्बद्ध प्रत्येक वस्तु तथा पत्नी, सन्तान और अन्य सारी झंझटों के प्रति भ्रामक आसक्ति है। मनुष्य अपने शारीरिक आराम के लिए पत्नी का चयन करता है और इसका परिणाम होता है सन्तान का जन्म। पत्नी तथा सन्तान के लिए निवासस्थान की आवश्यकता होती है और इस तरह घर बनाने की आवश्यकता पड़ती है। घोड़े, हाथी, गाय तथा कुत्ते—ये सब घरेलू पशु हैं और गृहस्थ को गृहस्थी सामान के तौर पर इन सबों को रखना होता है। आधुनिक सभ्यता में घोड़ों तथा हाथियों का स्थान पर्याप्त शक्तिशाली कारों तथा वाहनों ने ले लिया है। गृहस्थी चलाने के लिए मनुष्य को अपनी बैंक- पूँजी बढ़ानी पड़ती है और खजाने के विषय में सतर्क रहना होता है। भौतिक सम्पत्ति के ऐश्वर्य-प्रदर्शन के लिए मनुष्य को अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाये रखना होता है और साथ ही अपनी पूर्वस्थिति सँभालनी होती है। इसे भौतिक आसक्ति की भौतिक सभ्यता कहते हैं। भगवान् की भक्ति का अर्थ है समस्त भौतिक आसक्तियों का निषेध, जिनका ऊपर विस्तार से वर्णन हुआ है। भगवान् की कृपा से, महाराज परीक्षित को सारी भौतिक सुविधाएँ तथा अकंटक राज्य प्राप्त था जिससे वे राजा की अवचिल स्थिति को भोग सकते थे, लेकिन भगवत्कृपा से उन्होंने भौतिक आसक्ति से सारे सम्बन्ध तोड़ लिये। विशुद्ध भक्त की ऐसी ही स्थिति होती है। भगवान् के भक्त तथा उनके प्रति सहज प्रेम होने के कारण महाराज परीक्षित भगवान् की ओर से राज्य का कालि सँभाले थे और उत्तरदायी राजा की भाँति वे सतर्क थे कि उनके राज्य में कलियुग का प्रवेश न हो पाये। भगवद्भक्त कभी भी अपने घर की वस्तुओं को अपना नहीं मानता, अपितु प्रत्येक वस्तु को वह भगवान् की सेवा में समर्पित कर देता है। फलस्वरूप, भक्त की देखरेख में जीवों को ईश-अनुभूति का अवसर प्राप्त होता है।

घरेलू वस्तुओं के प्रति आसक्ति तथा भगवान् कृष्ण के प्रति आसक्तिका साथ-साथ चल पाना असंभव है। एक आसक्ति अंधकार का मार्ग है, तो दूसरी आसक्ति प्रकाश का मार्ग है। जहाँ प्रकाश होता है, वहाँ अंधकार नहीं रहता और जहाँ अंधकार है, वहाँ प्रकाश नहीं रहता। किन्तु पटुभक्त भगवान् के प्रति भक्तिभाव से हरवस्तु को प्रकाश के मार्ग की ओर मोड़ सकता है और इसका श्रेष्ठ उदाहरण पाण्डव हैं। महाराज युधिष्ठिर तथा उन्हीं की तरह के सारे गृहस्थ अपनी सारी तथाकथित भौतिक सम्पत्ति को भगवान् की सेवा से जोडक़र हर वस्तु को प्रकाश की ओर मोड़ सकते हैं, किन्तु जो प्रशिक्षित नहीं है अथवा हर वस्तु को भगवान् की सेवा में नहीं लगा सकता (निर्बन्ध: कृष्णसम्बन्धे) उसे सारे भौतिक सम्बन्धों का परित्याग कर देना चाहिए। तभी वह भगवान् की महिमा के श्रवण तथा कीर्तन का पात्र बन सकता है। दूसरे शब्दों में, जिसने महाराज परीक्षित की भाँति शुकदेव गोस्वामी जैसे योग्य व्यक्ति से श्रीमद्भागवत का एक दिन भी निष्ठापूर्वक श्रवण किया है, वह भौतिक वस्तुओं के प्रति सारी ममता को छोडऩे में समर्थ होता है। महाराज परीक्षित का अनुकरण मात्र करने और पेशेवर व्यक्ति से श्रीमद्भागवत का सात सौ वर्षों तक भी श्रवण करने से कोई लाभ नहीं हो सकता। श्रीमद्भागवत को पारिवारिक खर्च चलाने के लिए साधन बनाना भगवान् के चरणों पर सबसे भोंड़ा नामापराध है (सर्वशुभक्रियासाम्यमपि प्रमाद:)।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥