श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 4: सृष्टि का प्रक्रम  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
श्रिय: पतिर्यज्ञपति: प्रजापति-
र्धियां पतिर्लोकपतिर्धरापति: ।
पतिर्गतिश्चान्धकवृष्णिसात्वतां
प्रसीदतां मे भगवान् सतां पति: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
श्रिय:—समस्त ऐश्वर्य; पति:—स्वामी; यज्ञ—यज्ञ का; पति:—निर्देशक; प्रजा-पति:—समस्त जीवों के नायक; धियाम्—बुद्धि का; पति:—स्वामी; लोक-पति:—समस्त लोकों के स्वामी; धरा—पृथ्वी का; पति:—परम; पति:—अग्रणी; गति:—गन्तव्य; च—भी; अन्धक—यदुवंश के राजाओं में से एक; वृष्णि—यदुवंश का पहला राजा; सात्वताम्—यदुगण; प्रसीदताम्—कृपालु हों; मे—मुझ पर; भगवान्—श्रीकृष्ण; सताम्—भक्तों के; पति:—स्वामी ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् श्रीकृष्ण, जो समस्त भक्तों द्वारा पूज्य हैं, यदुवंश के अंधक तथा वृष्णि जैसे समस्त राजाओं के रक्षक तथा उनके यश हैं, लक्ष्मी देवी के पति, समस्त यज्ञों के निर्देशक अतएव समस्त जीवों के अग्रणी, समस्त बुद्धि के नियन्ता, समस्त दिव्य एवं भौतिक लोकों के अधिष्ठाता तथा पृथ्वी पर परम अवतार (सर्वेसर्वा) हैं, वे मुझ पर कृपालु हों।
 
तात्पर्य
 चूँकि शुकदेव गोस्वामी प्रमुख गतव्यलीक अर्थात् निष्कपट हैं, अतएव वे भगवान् श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में अपनी अनुभूति को समस्त सिद्धियों का सार भगवान् बताते हैं। प्रत्येक व्यक्ति लक्ष्मी जी की कृपा का आकांक्षी रहता है, लेकिन लोग यह नहीं जानते कि भगवान् श्रीकृष्ण लक्ष्मीजी के प्रियतम पति हैं। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है कि भगवान् अपने दिव्य धाम गोलोक वृन्दावन में सुरभि गायों को चराते रहते हैं और वहाँ लाखों लक्ष्मियाँ उनकी सेवा करती रहती हैं। ये सारी लक्ष्मियाँ उनकी अन्तरंगा शक्ति के अन्तर्गत ह्लादिनी शक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं और जब भगवान् इस पृथ्वी पर प्रकट हुए हैं, तो उन्होंने इस ह्लादिनी शक्ति के कार्यकलापों का आंशिक प्रदर्शन उन बद्धजीवों को आकृष्ट करने के लिए रासलीला के रूप में किया जो तुच्छ कामवासना की मृगतृष्णा के पीछे दौड़ते रहते हैं। शुकदेव गोस्वामी जैसे भगवान् के शुद्ध भक्त ने जो भौतिक जगत के गर्हित विषयी जीवन से पूर्ण रूप से विरक्त हैं, भगवान् की ह्लादिनी शक्ति के इस कार्य को कामवासना (यौन) से सम्बन्धित करके कभी विवेचन नहीं किया,अपितु उन संसारी लोगों के लिए जो विषयीजीवन के पीछे दौड़ते हैं अचिन्त्य दिव्य रस का आस्वादन कराने के लिए इसका विवेचन किया। संसार में मोह की जंजीरों में बद्ध होने का मूल कारण विषयी जीवन ही है, किन्तु शुकदेव गोस्वामी कभी भी संसारी विषयी जीवन के प्रति रुचि नहीं रखते थे। न ही भगवान् की ह्लादिनी शक्ति की अभिव्यक्ति का ऐसी पतित वस्तुओं से कोई सम्बन्ध होता है। भगवान् चैतन्य एक दृढ़ संन्यासी थे, यहाँ तक कि वे किसी भी स्त्री को अपने निकट नहीं आने देते थे, न ही उन्हें नमन करने तथा प्रणाम करने देते थे। उन्होंने जगन्नाथ मन्दिर में देवदासियों द्वारा की जानेवाली प्रार्थनाएँ तक कभी नहीं सुनीं, क्योंकि संन्यासी को स्त्री जाति द्वारा गाये गये गीत भी सुनने की मनाही है। फिर भी दृढ़ संन्यासी पद पर रहते हुए भी उन्होंने वृन्दावन की गोपियों द्वारा की गई पूजा की विधि को भगवान् की सर्वोच्च प्रेमाभक्ति के रूप में मान्यता दी। श्रीमती राधारानी तो ऐसी लक्ष्मियों में प्रधान हैं, अतएव वे भगवान् की ह्लादिनी अर्धांगिनी हैं और कृष्ण से अभिन्न हैं।

जीवन में सर्वोच्च लाभ प्राप्त करने के लिए वैदिक अनुष्ठानों में विभिन्न प्रकार के यज्ञों के करने की संस्तुतियाँ की गई हैं। बड़े-बड़े यज्ञ करने से प्राप्त होनेवाले वर अन्तत: लक्ष्मीजी द्वारा की गई कृपा ही हैं और लक्ष्मीजी के पति या प्रियतम होने के कारण भगवान् समस्त यज्ञों के भी स्वामी हैं। वे सभी प्रकार के यज्ञों के अन्तिम भोक्ता हैं, अतएव विष्णु का एक अन्य नाम यज्ञपति भी है। भगवद्गीता में संस्तुति की गई है कि प्रत्येक कार्य यज्ञपति के लिए किया जाय (यज्ञार्थात् कर्मण:), अन्यथा मनुष्य के कार्य प्रकृति के नियम द्वारा उसके बन्धन का कारण होंगे। जो लोग समस्त भ्रान्त धारणाओं (व्यलीकम्) से मुक्त नहीं हैं, वे छोटे-छोटे देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ करते हैं, लेकिन भगवद्भक्त अच्छी तरह जानते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण ही समस्त यज्ञ-अनुष्ठानों के परम भोक्ता हैं, अतएव वे संकीर्तन यज्ञ (श्रवणं कीर्तनं विष्णो:) करते हैं, जो इस कलियुग के लिए विशेषरूप से संस्तुत है। कलियुग में अन्य प्रकार के यज्ञों को सम्पन्न करना सम्भव नहीं है, क्योंकि व्यवस्था अपर्याप्त है और कुशल पुरोहित भी नहीं मिल पाते।

भगवद्गीता से (३.१०-११) हमें यह सूचना मिलती है कि ब्रह्मा ने, ब्रह्माण्ड में बद्धजीवों को जन्म देने के पश्चात्, उन्हें यज्ञ करने तथा सम्पन्न जीवन बिताने का आदेश दिया। ऐसे यज्ञों के सम्पन्न करने से बद्धजीवों को कभी भी जीवन-निर्वाह करने में कठिनाई नहीं होती। अन्ततोगत्वा वे अपने जीवन को शुद्ध कर सकते हैं। वे देखेंगे कि उनकी उन्नति आध्यात्मिक जगत में सहज में ही हो गई है और जीव का वही वास्तविक स्वरूप है। बद्धजीव को चाहिए कि वह कभी भी यज्ञ, दान तथा तपस्या का परित्याग किसी भी दशा में न करे। ऐसे सभी यज्ञों का उद्देश्य यज्ञपति अर्थात् भगवान् को प्रसन्न करना है, इसीलिए भगवान् प्रजापति भी हैं। कठोपनिषद् के अनुसार अकेले भगवान् असंख्य जीवों के नायक हैं। सारे जीव भगवान् द्वारा पालित हैं (एको बहूनां यो विदधाति कामान्) इसीलिए भगवान् परम भूतभृत् या सभी जीवों के पालक कहलाते हैं।

जीवों को उनके पूर्वकर्मों के अनुसार ही बुद्धि प्रदान की जाती है। सारे जीवों को एकसमान गुणवाली बुद्धि प्रदान नहीं की जाती क्योंकि बुद्धि के ऐसे विकास के पीछे भगवान् का नियन्त्रण रहता है जैसाकि भगवद्गीता (१५.१५) में घोषणा की गई है। परमात्मा-रूप में भगवान् जन-जन के हृदय में वास करते हैं और उन्हीं से स्मृति, ज्ञान की शक्ति तथा विस्मृति आती है (मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च)। एक व्यक्ति भगवत्कृपा से अपने पूर्वकर्मों को भलीभाँति स्मरण कर सकता है जब कि दूसरा व्यक्ति नहीं कर पाता। कोई व्यक्ति भगवत्कृपा से अत्यधिक बुद्धिमान होता है, किन्तु उसी नियन्त्रण से दूसरा व्यक्ति मूर्ख होता है। अतएव भगवान् धियाम्पति अथवा बुद्धि के स्वामी हैं।

बद्धजीव भौतिक जगत के स्वामी बनने का प्रयास करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी उच्चतम बुद्धि का प्रयोग करके भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जताना चाहता है। बद्धजीव द्वारा बुद्धि का यह दुरुपयोग पागलपन कहलाता है। मनुष्य को अपनी बुद्धि का उपयोग भवबन्धन से मुक्त होने के लिए करना चाहिए। लेकिन बद्धजीव अपने पागलपन के कारण इन्द्रियतृप्ति में ही सारी शक्ति तथा बुद्धि लगा देता है और इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह सभी प्रकार के दुष्कर्म करता है। परिणाम यह होता है कि पागल बद्धजीव मुक्त जीवन प्राप्त न करके पुन: पुन: अनेक प्रकार के बन्धनों में पड़ता रहता है। भौतिक जगत में हम जो कुछ देखते हैं, वह भगवान् की ही सृष्टि है। अतएव समस्त ब्रह्माण्डों में प्रत्येक वस्तु के वे ही असली स्वामी हैं। बद्धजीव भगवान् के वश में रहकर इस सृष्टि के एक अंश का ही भोग कर सकता है, लेकिन आत्म-निर्भर बनकर नहीं। यही ईशोपनिषद् का उपदेश है। मनुष्य को ब्रह्माण्ड के स्वामी द्वारा प्रदत्त वस्तुओं से सन्तुष्ट रहना चाहिए। यह तो निरा पागलपन है कि कोई दूसरे के हिस्से की भौतिक सम्पत्ति में अधिकार जताने का प्रयास करता है।

ब्रह्माण्ड के स्वामी बद्धजीवों पर अपनी अहैतुकी कृपावश अपनी ही शक्ति (आत्म-माया) द्वारा बद्धजीवों के साथ नित्य सम्बन्ध स्थापित करने के लिए अवतरित होते हैं। वे सबों को उनके नियन्त्रण में कुछ हद तक झूठे ही भोक्ता बनने के बजाय अपनी शरण में आने के लिए आदेश देते हैं। जब वे इस तरह अवतरित होते हैं, तो वे यह दिखा देते हैं कि उनमें भोगने का कितना बड़ा सामर्थ्य है और वे एकसाथ सोलह हजार पत्नियों के साथ विवाह करके भोग की अपनी शक्ति का प्रदर्शन उदाहरण के तौर पर करते हैं। बद्धजीव केवल एक पत्नी का पति बनकर गर्व का अनुभव करता है, लेकिन भगवान् इस पर हँसते हैं; बुद्धिमान व्यक्ति जान सकता है कि असली पति कौन है। वास्तव में भगवान् ही अपनी सृष्टि की सारी स्त्रियों के पति हैं, लेकिन भगवान् के वशीभूत बद्धजीव अपने को एक या दो पत्नियों का पति होने पर गर्व का अनुभव करता है।

इस श्लोक में वर्णित विभिन्न प्रकार के पतियों की ये योग्यताएँ भगवान् श्रीकृष्ण को ही शोभा देती हैं, अतएव शुकदेव गोस्वामी ने यदुवंश के पति तथा गति का विशेष उल्लेख किया है। यदुवंश के सभी सदस्य जानते थे कि श्रीकृष्ण ही सब कुछ हैं और जब उन्होंने पृथ्वी पर अपनी दिव्य लीलाएँ समाप्त कर लीं, तो वे सभी उनके पास लौटना चाह रहे थे। यदुवंश का विनाश भगवान् की इच्छा से हुआ, क्योंकि इसके सदस्यों को भगवान् के साथ भगवद्धाम वापस जाना था। यदुवंश का संहार परमेश्वर द्वारा सृजित एक भौतिक प्रदर्शन था अन्यथा यदुवंश के सारे सदस्य तथा भगवान् नित्य संगी थे। अतएव भगवान् समस्त भक्तों के मार्गदर्शक हैं, इसीलिए शुकदेव गोस्वामी ने प्रेमपूरित भावों से भगवान् को सादर नमस्कार किया।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥