श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 4: सृष्टि का प्रक्रम  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक
यदङ्‍घ्र्‌यध्यानसमाधिधौतया
धियानुपश्यन्ति हि तत्त्वमात्मन: ।
वदन्ति चैतत् कवयो यथारुचं
स मे मुकुन्दो भगवान् प्रसीदताम् ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
यत्-अङ्घ्रि—जिसके चरणकमल; अभिध्यान—प्रत्येक क्षण चिन्तन करते; समाधि—समाधि; धौतया—धुल जाने से; धिया— ऐसी विमल बुद्धि से; अनुपश्यन्ति—महापुरुषों का अनुसरण करते हुए देखते हैं; हि—निश्चय ही; तत्त्वम्—परम सत्य को; आत्मन:—परमेश्वर का तथा अपना; वदन्ति—कहते हैं; च—भी; एतत्—यह; कवय:—दार्शनिक या विद्वान पंडित; यथा रुचम्—जैसा वह सोचता है; स:—वह; मे—मेरा; मुकुन्द:—भगवान् कृष्ण (जो मुक्ति के दाता हैं); भगवान्—भगवान्; प्रसीदताम्—मुझ पर प्रसन्न हों ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् श्रीकृष्ण ही मुक्तिदाता हैं। भक्त प्रतिपल उनके चरण-कमलों का चिन्तन करके और महापुरुषों के चरणचिन्हों पर चलते हुए समाधि में परम सत्य का दर्शन कर सकता है। तथापि विद्वान ज्ञानीजन उनके विषय में अपनी सनक के अनुसार चिन्तन करते हैं। ऐसे भगवान् मुझ पर प्रसन्न हों।
 
तात्पर्य
 योगी-जन इन्द्रियों को वश में करने का कठिन प्रयास करके प्रत्येक के भीतर स्थित परमात्मा की झलक पाने के लिए योग की समाधि में स्थित होते हैं, किन्तु शुद्ध भक्त प्रतिपल भगवान् के चरणकमलों का स्मरण करते हुए वास्तविक समाधि को तुरन्त ही प्राप्त होते हैं, क्योंकि ऐसी अनुभूति के द्वारा उनके मन तथा बुद्धि भवरोग से धुल कर पूर्ण रूप से स्वच्छ हो जाते हैं। शुद्ध भक्त अपने आपको जन्म-मृत्यु के सागर में पतित हुआ सोचता है, अतएव वह अपने को उबारने के लिए भगवान् से निरन्तर प्रार्थना करता है। वह भगवान् के चरणकमलों की धूलि का एक कण बनना चाहता है। शुद्ध भक्त भगवत्कृपा से भौतिक भोग के सारे आकर्षण से पूरी तरह रहित हो जाता है और कल्मष से दूर रहने के लिए वह निरन्तर भगवान् के चरणकमलों का चिन्तन करता रहता है। भगवान् के परम भक्त राजा कुलशेखर ने प्रार्थना की है—

कृष्ण त्वदीयपदपंकजपञ्जरान्तम् अद्यैव मे विशतु मानसराजहंस:।

प्राणप्रयाणसमये कफवातपित्तै: कण्ठावरोधनविधौ स्मरणं कुतस्ते ॥

“हे भगवान् कृष्ण! मेरी प्रार्थना है कि मेरा मन रूपी हंस तुरन्त आपके चरणकमल के डंठलों तक डूब कर उनके जाल में उलझ जाय अन्यथा मृत्यु के समय, जब मेरा गला कफ से रुद्ध हो जायेगा, तो भला मैं आपका चिन्तन कैसे कर सकूँगा?”

हंस तथा कमलनाल के मध्य घनिष्ठ सम्बन्ध है। अतएव यह उपमा अत्यन्त उपयुक्त है: हंस या परमहंस बने बिना भगवान् के चरणकमलों के डंठलों के जाल तक प्रवेश कर पाना असम्भव है। जैसाकि ब्रह्म-संहिता में कहा गया है कि ज्ञानी अपने पाण्डित्य के बावजूद अनन्त काल तक चिन्तन करने पर भी परम सत्य का स्वप्न तक नहीं देख सकता। भगवान् को अधिकार है कि ऐसे ज्ञानियों के समक्ष प्रकट न हों और चूँकि ऐसे लोग भगवान् के चरणकमलों के डंठलों के जाल में प्रवेश नहीं कर पाते, अतएव सारे ज्ञानी अपना-अपना निष्कर्ष निकालते हैं और अन्त में अपनी-अपनी रुचि के अनुसार (यथारुचम्) यह कहकर समझौता करते हैं “जितने पंथ उतने मत”। लेकिन भगवान् कोई दुकानदार तो हैं नहीं जो ज्ञान के विनिमय में सभी प्रकार के ग्राहकों को प्रसन्न करने का प्रयास कर सकें। भगवान् तो पूर्ण पुरुषोत्तम परमेश्वर हैं और वे चाहते हैं कि वे लोग पूर्ण रूप से उनके ही शरणागत हों। लेकिन शुद्ध भक्त पूर्ववर्ती आचार्यों के पथ का अनुसरण करते हुए अपने गुरु के पारदर्शी माध्यम से परमेश्वर का दर्शन कर सकता है (अनुपश्यन्ति)। शुद्ध भक्त मानसिक चिन्तन (ज्ञान) द्वारा भगवान् का दर्शन करने का प्रयास कभी नहीं करता अपितु वह आचार्यों के पदचिह्नों पर चलता है (महाजनो येन गत: स पन्था:)। अतएव वैष्णव आचार्यों में भगवान् तथा भक्तों को लेकर कोई भेद नहीं रहता। भगवान् चैतन्य जोर देकर कहते हैं कि जीव भगवान् का नित्य दास है और वह एक ही साथ भगवान् से एक तथा पृथक् है। भगवान् चैतन्य के इस तत्त्व को वैष्णव मत के चारों सम्प्रदाय समान रूप से मानते हैं (मोक्ष के बाद भी भगवान् की नित्य दासता सभी स्वीकार करते हैं) और ऐसा कोई वैध वैष्णव आचार्य नहीं है, जो भगवान् तथा अपने आपको एक सोच सके।

भगवान् की सेवा में शत प्रतिशत लगे रहनेवाले भक्त की यह विनम्रता भगवद्भक्त को समाधि दशा प्राप्त कराती है, जिससे वह प्रत्येक वस्तु की अनुभूति करता है, क्योंकि भगवान् निष्ठावान भक्त के समक्ष प्रकट होते हैं जैसाकि भगवद्गीता (१०.१०) में कहा गया है। भगवान् प्रत्येक व्यक्ति की बुद्धि के स्वामी होने से (यहाँ तक कि अभक्तों के भी) अपने भक्त को समुचित बुद्धि प्रदान करते हैं जिससे भक्त स्वत: भगवान् तथा उनकी विभिन्न शक्तियों के विषय में असली तथ्यों से अवगत हो जाता है। भगवान् न तो किसी की चिन्तन शक्ति से, न परम सत्य विषयक वाग्जाल से प्रकट होते हैं। वे भक्त के समक्ष तभी प्रकट होते हैं जब भक्त के सेवा-भाव की प्रवृत्ति से पूर्ण रूप से संतुष्ट होते हैं। शुकेदव गोस्वामी न तो चिन्तक हैं, न ही ‘जितने पंथ उतने मत’ सिद्धान्त के समर्थक हैं। अपितु वे केवल भगवान् से उनके दिव्य आनन्द का आह्वान करते हुए प्रार्थना करते हैं। भगवान् को जानने का यही तरीका है।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥