श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 4: सृष्टि का प्रक्रम  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक
प्रचोदिता येन पुरा सरस्वती
वितन्वताजस्य सतीं स्मृतिं हृदि ।
स्वलक्षणा प्रादुरभूत् किलास्यत:
स मे ऋषीणामृषभ: प्रसीदताम् ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
प्रचोदिता—प्रेरित; येन—जिसके द्वारा; पुरा—सृष्टि के प्रारम्भ में; सरस्वती—विद्या की देवी; वितन्वता—विस्तारित; अजस्य— प्रथम जीव ब्रह्मा का; सतीम् स्मृतिम्—शक्तिशाली स्मरण शक्ति; हृदि—हृदय में; स्व—अपना; लक्षणा—लक्षित; प्रादुरभूत्— उत्पन्न किया गया; किल—मानो; आस्यत:—मुँह से; स:—वह; मे—मुझ पर; ऋषीणाम्—शिक्षकों का; ऋषभ:—प्रमुख; प्रसीदताम्—प्रसन्न हों ।.
 
अनुवाद
 
 जिन्होंने सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मा के हृदय में शक्तिशाली ज्ञान का विस्तार किया और सृष्टि तथा अपने विषय में पूर्ण ज्ञान की प्रेरणा दी और जो ब्रह्मा के मुख से प्रकट हुए प्रतीत हुए, वे भगवान् मुझ पर प्रसन्न हों।
 
तात्पर्य
 हम पहले ही यह बता चुके हैं, कि ब्रह्मा से लेकर क्षुद्र चींटी तक सारे जीवों के परमात्मा-रूप में भगवान् प्रत्येक जीव को वांछित ज्ञान प्रदान करते हैं। प्रत्येक जीव भगवान् से ५०:६४ के अनुपात में या पूर्ण ज्ञान का ७८त्न अर्जित करने की क्षमता रखता है। चूँकि जीव भगवान् का स्वाभाविक अंशमात्र है, अतएव वह भगवान् के सम्पूर्ण ज्ञान को आत्मसात् करने में असमर्थ होता है। बद्ध अवस्था में जीव, शरीर के परिवर्तन या मृत्यु के साथ सब कुछ भूल जाता है। यही ज्ञान पुन: प्रत्येक जीव में भगवान् द्वारा जीव के हृदय के भीतर से प्रेरित किया जाता है और यही ज्ञान की जागृति कहलाती है, क्योंकि यह निद्रा या अचेतनावस्था से जागरण के तुल्य है। यह ज्ञान की जागृति भगवान् के पूर्ण रूप से अधीन है, अतएव व्यवहारजगत में विभिन्न व्यक्तियों में ज्ञान की विभिन्न कोटियाँ पाई जाती हैं। यह ज्ञान की जागृति न तो स्वत: घटित होती है, न भौतिक अन्त:क्रिया है। इसकी पूर्ति करनेवाले साक्षात् भगवान् हैं (धियां पति:), क्योंकि ब्रह्मा तक परम स्रष्टा के इस नियम के अधीन हैं। सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मा माता-पिता के बिना उत्पन्न होते हैं, क्योंकि तब कोई अन्य जीव न था। ब्रह्मा उस कमल से उत्पन्न होते हैं, जो गर्भोदकशायी विष्णु की नाभि से प्रकट होता है और इसीलिए वे अज कहलाते हैं। ये ब्रह्मा या अज भी भगवान् के अंशरूप जीव हैं, लेकिन भगवान् के परम पवित्र भक्त होने के नाते, भगवान् मुख्य सृष्टि कर लेने के बाद प्रकृति के द्वारा उन्हें सृष्टि करने की प्रेरणा देते हैं। अतएव न तो प्रकृति, न ही ब्रह्मा भगवान् से स्वतन्त्र हैं। भौतिक विज्ञानी प्रकृति की प्रतिक्रियाओं का अवलोकन ही कर सकते हैं, वे ऐसे कार्यकलापों के पीछे कार्यरत निर्देशन को नहीं समझ पाते जिस तरह कि एक शिशु बिजली के करतब को तो देखता है, किन्तु उसे बिजलीघर के इंजीनियर का कोई ज्ञान नहीं होता। भौतिक विज्ञानी का यह अपूर्ण ज्ञान उसकी अल्पज्ञता के कारण है। अतएव वैदिक ज्ञान सर्वप्रथम ब्रह्मा के अन्त:करण मेंं प्रविष्ट कराया गया जिससे ऐसा लगता है कि ब्रह्मा ही वैदिक ज्ञान का वितरण करनेवाले हैं। निस्सन्देह, ब्रह्मा वैदिक ज्ञान के प्रवक्ता हैं, किन्तु वास्तव में भगवान् ने ही उन्हें ऐसा दिव्य ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया, क्योंकि यह ज्ञान सीधे भगवान् से अवतरित होता है। इसीलिए वेदों को अपौरुषेय अर्थात् किसी सृजित जीव द्वारा प्रदत्त न किये गये, कहा जाता है। सृष्टि के पूर्व भगवान् उपस्थित थे (नारायण: परोऽव्यक्तात्), अतएव भगवान् द्वारा उच्चरित शब्द दिव्य ध्वनि की लहरियाँ हैं। ध्वनि के दो प्रकारों, प्राकृत तथा अप्राकृत, में बहुत बड़ा अन्तर है। भौतिक-शास्त्री केवल प्राकृत ध्वनि या भौतिक आकाश में स्पन्दित ध्वनि पर ही विचार कर सकता है, अतएव हमें यह जान लेना चाहिए कि सांकेतिक अभिव्यंजनाओं के रूप में अंकित वैदिक ध्वनियाँ इस ब्रह्माण्ड में किसी के द्वारा तब तक नहीं समझी जा सकतीं जब तक उन्हें अप्राकृत ध्वनि के स्पन्दनों द्वारा प्रेरित न किया जाय जो शिष्य-परम्परा द्वारा भगवान् से ब्रह्मा को, ब्रह्मा से नारद को, नारद से व्यास को और आगे इसी क्रम में प्राप्त होती है। कोई भी संसारी विद्वान वैदिक मन्त्रों के असली आशय को न तो प्रकट कर सकता है, न उनको अनुदित कर सकता है। इन्हें तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक कोई वैध गुरु द्वारा प्रेरित या दीक्षित न होले। आदि गुरु तो स्वयं भगवान् हैं और परम्परा से यह ज्ञान चलता रहा है जैसाकि भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय में स्पष्ट कहा गया है। अतएव दिव्य ज्ञान जब तक किसी वैध परम्परा से प्राप्त नहीं होता, तब तक उसे विफल (विफला मता:) मानना चाहिए, भले ही वह कला या विज्ञान में कितनी ही प्रगति क्यों न कर ले।

शुकदेव गोस्वामी अपने अन्त:करण में भगवान् द्वारा प्रेरित होकर ही भगवान् से प्रार्थना कर रहे हैं जिससे वे महाराज परीक्षित द्वारा पूछे गये सृष्टि-सम्बन्धी तथ्यों को सही-सही बतला सकें। गुरु संसारी विद्वान की तरह, सैद्धान्तिक चिन्तक नहीं होता, अपितु वह श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् होता है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥