श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 4: सृष्टि का प्रक्रम  »  श्लोक 9

 
श्लोक
यथा गुणांस्तु प्रकृतेर्युगपत् क्रमशोऽपि वा ।
बिभर्ति भूरिशस्त्वेक: कुर्वन् कर्माणि जन्मभि: ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
यथा—जिस तरह वे हैं; गुणान्—गुणों को; तु—लेकिन; प्रकृते:—भौतिक शक्ति के; युगपत्—एकसाथ; क्रमश:—धीरे-धीरे; अपि—भी; वा—अथवा; बिभर्ति—पालन करता है; भूरिश:—अनेक रूपों में; तु—लेकिन; एक:—सर्वोच्च एक; कुर्वन्— कार्य करते हुए; कर्माणि—कार्यकलाप; जन्मभि:—अवतारों के द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् एक हैं, चाहे वे प्रकृति के गुणों से अकेले कर्म करें या एकसाथ कई रूपों में विस्तार करें या कि प्रकृति के गुणों के निर्देशन हेतु बारी-बारी से विस्तार करें।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥