श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 5: समस्त कारणों के कारण  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक
विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेऽमुया ।
विमोहिता विकत्थन्ते ममाहमिति दुर्धिय: ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
विलज्जमानया—लज्जित व्यक्ति द्वारा; यस्य—जिसका; स्थातुम्—ठहरने के लिए; ईक्षा-पथे—समक्ष; अमुया—भ्रामिका शक्ति द्वारा; विमोहिता:—जो मोहित हैं; विकत्थन्ते—प्रलाप करते हैं; मम—यह मेरा है; अहम्—मैं ही सब कुछ हूँ; इति—इस तरह भला-बुरा कहकर; दुर्धिय:—इस प्रकार बुरा सोचा गया ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् की भ्रामिका शक्ति (माया) अपनी स्थिति से लज्जित होने के कारण सामने ठहर नहीं पाती, लेकिन जो लोग इसके द्वारा मोहित होते हैं, वे “यह मैं हूँ” और “यह मेरा है” के विचारों में लीन रहने के कारण व्यर्थ की बातें करते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् की दुर्जेय शक्तिशाली छलिनी शक्ति या तीसरी शक्ति, जो अज्ञान का प्रतिनिधित्व करती है, सम्पूर्ण जगत को मोहित कर सकती है, तो भी वह इतनी प्रबल नहीं होती कि परमेश्वर के समक्ष ठहर सके। अविद्या तो भगवान् के पीछे रहकर वहीं से जीवों को गुमराह करती है। मोहग्रस्त जीव का मुख्य लक्षण है कि वह व्यर्थ की बकवास करता है। यह वैदिक साहित्य के सिद्धान्तों से समर्थित नहीं रहती और सबसे अधिक निकृष्ट बकवास है—“यह मैं हूँ, यह मेरा है।” ईशविहीन सभ्यता ऐसे झूठे विचारों पर ही चलती है और ऐसे व्यक्ति ईश्वर की वास्तविक अनुभूति के बिना ही मिथ्या ईश्वर को मानते हैं या उन लोगों को, जो पहले से ठगिनी शक्ति द्वारा मोहग्रस्त होते हैं, गुमराह करने के लिए अपने को ही ईश्वर घोषित कर देते हैं। किन्तु जो भगवान् के समक्ष रहते हैं तथा जो उनकी शरण ग्रहण किये रहते हैं, वे ठगिनी शक्ति द्वारा प्रभावित नहीं होते। अतएव वे इस भ्रान्त धारणा से कि, “यह मैं हूँ, यह मेरा है” मुक्त रहते हैं। इस तरह वे न तो मिथ्या ईश्वर को स्वीकार करते हैं, न अपने को परमेश्वर के तुल्य कहते हैं। इस श्लोक में मोहग्रस्त व्यक्ति की पहचान स्पष्ट रुप से की गई है।
 
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