श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 5: समस्त कारणों के कारण  »  श्लोक 16

 
श्लोक
नारायणपरो योगो नारायणपरं तप: ।
नारायणपरं ज्ञानं नारायणपरा गति: ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
नारायण-पर:—नारायण को जानने के लिए; योग:—मन की एकाग्रता; नारायण-परम्—नारायण को प्राप्त करने के उद्देश्य से; तप:—तपस्या; नारायण-परम्—नारायण की झलक पाने के लिए; ज्ञानम्—दिव्य ज्ञान की संस्कृति; नारायण-परा—नारायण के धाम में प्रवेश करते ही मोक्ष का पथ समाप्त हो जाता है; गति:—उत्तरोत्तर पथ ।.
 
अनुवाद
 
 सभी प्रकार के ध्यान या योग नारायण की अनुभूति प्राप्त करने के लिए हैं। सारी तपस्याओं का लक्ष्य नारायण को प्राप्त करने के निमित्त है। दिव्य ज्ञान का संवर्धन नारायण की झलक प्राप्त करने के लिए है और चरम मोक्ष तो नारायण के धाम में प्रवेश करने के लिए ही है।
 
तात्पर्य
 ध्यान योग की दो पद्धतियाँ है—अष्टांग योग तथा सांख्य योग। अष्टांग योग मन को एकाग्र करने का अभ्यास है, जिसमें ध्यान, धारण, आसन, प्राणायाम आदि की विधियों से अपने को समस्त व्यस्तताओं से मुक्त कर लिया जाता है। सांख्य योग क्षणिक और सत्य का अन्तर बताने वाला है। लेकिन दोनों ही पद्धतियाँ अन्ततोगत्वा निर्विशेष ब्रह्म की अनुभूति के लिए हैं, जो भगवान् नारायण की आंशिक अभिव्यक्ति है। जैसाकि हम पहले कह चुके हैं निर्विशेष ब्रह्मतेज भगवान् का अंशमात्र है। निर्विशेष ब्रह्म
साक्षात् भगवान् पर स्थित है, फलस्वरूप ब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान् का महिमा-गायन है। इसकी पुष्टि भगवद्गीता तथा मत्स्यपुराण दोनों से होती है। गति शब्द चरम गन्तव्य या मोक्ष की अन्तिम स्थिति का सूचक है। निर्विशेष ब्रह्मज्योति से तादात्म्य चरम मोक्ष नहीं है। इससे तो श्रेष्ठ है अनन्त वैकुण्ठ लोकों में से किसी एक में भगवान् की भव्य संगति। अतएव निष्कर्ष निकलता है कि नारायण या भगवान् सभी प्रकार की योग-पद्धतियों तथा सभी प्रकार के मोक्ष के चरम लक्ष्य हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥