श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 5: समस्त कारणों के कारण  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
तामसादपि भूतादेर्विकुर्वाणादभून्नभ: ।
तस्य मात्रा गुण: शब्दो लिङ्गं यद् द्रष्टृद‍ृश्ययो: ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
तामसात्—मिथ्या अहंकार के अंधकार से; अपि—निश्चय ही; भूत-आदे:—भौतिक तत्त्वों का; विकुर्वाणात्—रूपान्तरण के कारण; अभूत्—उत्पन्न हुआ; नभ:—आकाश; तस्य—उसका; मात्रा—सूक्ष्म रूप; गुण:—गुण; शब्द:—ध्वनि; लिङ्गम्— लक्षण; यत्—जो; द्रष्टृ—द्रष्टा; दृश्ययो:—देखे गये का ।.
 
अनुवाद
 
 मिथ्या अंहकार के अंधकार से पाँच तत्त्वों में से पहला तत्त्व आकाश उत्पन्न होता है। इसका सूक्ष्म रूप शब्द का गुण है, ठीक उसी प्रकार जिस तरह द्रष्टा का दृश्य से सम्बन्ध होता है।
 
तात्पर्य
 पाँच तत्त्व, जिनके नाम आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी हैं, मिथ्या अहंकार के अंधकार के ही विभिन्न गुण हैं। इसका अर्थ हुआ कि महत् तत्त्व के रूप में मिथ्या अहंकार भगवान् की तटस्था शक्ति से उत्पन्न होता है और भौतिक सृष्टि पर प्रभुता जताने के इस मिथ्या अहंकार के कारण ही जीव के मिथ्या भोग के लिए सारे अवयव उत्पन्न होते हैं। जीव भोक्ता के रूप में भौतिक तत्त्वों के ऊपर प्रधान कारक बना रहता है यद्यपि पृष्ठभूमि में परमेश्वर रहता है। वास्तव में भगवान् के अतिरिक्त अन्य कोई भोक्ता नहीं कहा जा सकता, लेकिन जीव झूठे ही भोक्ता बनना चाहता है। मिथ्या अहंकार का यही मूल है। जब मोहग्रस्त जीव इसकी इच्छा करता है, तो भगवान् की इच्छा से छाया तत्त्व उत्पन्न होतें हैं और जीवों को उनके पीछे उसी तरह दौडऩे दिया जाता है, जिस तरह मृगमरीचिका के पीछे मृग।

यह कहा गया है कि पहले ध्वनि तन्मात्रा उत्पन्न होती है और उसके बाद आकाश तत्त्व निर्माण होता है, और इस श्लोक में पुष्टि की गई है कि वास्तव में ऐसा ही होता है, लेकिन ध्वनि आकाश का सूक्ष्मरूप है और इनमें जो अन्तर है, वह द्रष्टा तथा दृश्य के अन्तर जैसा है। ध्वनि वास्तविक वस्तु का प्रतिरूप है, जिस तरह वस्तु के बारे में बोला हुआ शब्द या ध्वनि उस वस्तु के वर्णन का बोध कराता है। अतएव ध्वनि वस्तु का सूक्ष्म गुण है। इसी प्रकार भगवान् का ध्वनि रूप उनके लक्षणों के सम्बन्ध में भगवान् का पूर्ण रूप है जैसाकि भगवान् कृष्ण तथा भगवान् राम के पिता वसुदेव तथा महाराज दशरथ ने देखा था। भगवान् का ध्वनि रूप साक्षात् भगवान् से अभिन्न है, क्योंकि भगवान् तथा उनका ध्वनि रूप परम ज्ञान हैं। भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने हमें उपदेश दिया है कि भगवान् के पवित्र नाम में, जो भगवान् का ध्वनि रूप है, भगवान् की सारी शक्तियाँ निहित हैं। अतएव भगवान् के पवित्र नाम के ध्वनि रूप के उच्चारण से मनुष्य तुरन्त भगवान् के सान्निध्य का आनन्द उठा सकता है और शुद्ध भक्त को तुरन्त ही भगवान् का स्वरूप प्रकट हो जाता है। अतएव शुद्ध भक्त भगवान् से एक क्षण के लिए भी विलग नहीं होता। अतएव जो भक्त निरन्तर भगवान् के सम्पर्क में रहने की कामना करता है उसे शास्त्रों द्वारा अनुमोदित भगवान् के पवित्र नाम—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे, हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे—का कीर्तन करना चाहिए। जो इस प्रकार भगवान् का सान्निध्य प्राप्त कर लेता है, वह निश्चित रूप से मिथ्या अहंकार से उत्पन्न जगत के अंधकार से उबर आता है (तमसो मा ज्योतिर्गमय)।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥