श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 5: समस्त कारणों के कारण  »  श्लोक 37

 
श्लोक
पुरुषस्य मुखं ब्रह्म क्षत्रमेतस्य बाहव: ।
ऊर्वोर्वैश्यो भगवत: पद्‍भ्यां शूद्रो व्यजायत ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
पुरुषस्य—भगवान् का; मुखम्—मुँह; ब्रह्म—ब्राह्मण हैं; क्षत्रम्—क्षत्रिय; एतस्य—इसके; बाहव:—भुजाएँ; ऊर्वो:—जाँघें; वैश्य:—वणिक वर्ग; भगवत:—भगवान् के; पद्भ्याम्—पाँवों से; शूद्र:—श्रमिक वर्ग; व्यजायत—प्रकट हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 ब्राह्मण वर्ग भगवान् के मुख का, क्षत्रिय उनकी भुजाओं का और वैश्य उनकी जाँघों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि शूद्र वर्ग उनके पाँवों से उत्पन्न हुआ है।
 
तात्पर्य
 सारे जीव भगवान् के अंश बताये जाते हैं। इस श्लोक में बताया गया है कि वे ऐसे किस तरह हैं। मानव समाज के चार विभाग हैं—बुद्धिमानवर्ग (ब्राह्मण), प्रशासकवर्ग (क्षत्रिय), व्यापारीवर्ग (वैश्य) तथा श्रमिकवर्ग (शूद्र)। ये सब भगवान् के शरीर के विविध अंग हैं। इस तरह कोई भी वर्ग भगवान् से भिन्न नहीं है। मुँह तथा पाँव स्वाभाविक दृष्टि से अभिन्न हैं, किन्तु शरीर में गुण की दृष्टि से मुँह या सिर पाँवों से अधिक महत्त्वपूर्ण है। लेकिन साथ ही साथ मुँह, पाँव, भुजाएँ तथा जाँघे शरीर के अवयव हैं। भगवान् के शरीर के ये अंग परम पूर्ण सेवा के निमित्त हैं। मुँह बोलने तथा खाने के लिए हैं, भुजाएँ शरीर की रक्षा के लिए हैं, पाँव शरीर को इधर-उधर ले जाने के लिए होते हैं तथा कमर शरीर को स्थित रखने के लिए होती है। अतएव समाज के बुद्धिमान वर्ग को विराट रूप का मुख होने के नाते, बोलना चाहिए और शरीर की क्षुधा-तृप्ति के लिए भोजन भी करना चाहिए। भगवान् की क्षुधा यज्ञ के फल को ग्रहण करना है। बुद्धिमान वर्ग या ब्राह्मणों को ऐसे यज्ञ सम्पन्न करने में अत्यन्त कुशल होना चाहिए और अधीन वर्गों को चाहिए कि ऐसे यज्ञों में हाथ बँटायें। परमेश्वर के लिए बोलने का अर्थ है भगवान् के असली स्वभाव का एवं सम्पूर्ण शरीर के अन्य समस्त भागों की स्थिति का प्रसार करना। इसीलिए ब्राह्मणों को ज्ञान के चरम स्रोत वेदों को जानना चाहिए। वेद का अर्थ है ज्ञान तथा अन्त का अर्थ है उसका छोर। भगवद्गीता के अनुसार भगवान् समस्त वस्तुओं के स्रोत हैं (अहं सर्वस्य प्रभव:) और इस तरह ज्ञान का अन्त (वेदान्त) भगवान् को जानने, भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध
को जानने तथा इस सम्बन्ध के अनुसार कार्य करने में है। जिस तरह शरीर के अंग शरीर से सम्बन्धित होते हैं, उसी प्रकार जीव को भगवान् के साथ अपना सम्बन्ध जानना चाहिए। मनुष्य-जीवन विशेष रूप से इसी प्रयोजन के लिए अर्थात् भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को जानने के लिए मिला है। इस सम्बन्ध को जाने बिना मनुष्य-जीवन व्यर्थ है। इसीलिए बुद्धिमान वर्ग के लोगों या ब्राह्मणों का विशेष उत्तरदायित्व है कि भगवान् के साथ हमारे इस सम्बन्ध का प्रसार करें और सामान्य जनता को सही मार्ग पर लायें। प्रशासक वर्ग जीवों की रक्षा के निमित्त है, जिससे सारे जीव इस प्रयोजन में सफल रहें। व्यापारी वर्ग अन्न उत्पन्न करने तथा उसे सारे समाज में वितरित करने के लिए है, जिससे सारी जनता को अवसर मिले कि वे सुखपूर्वक रह सकें और मनुष्य जीवन के कर्तव्यों को निभा सकें। व्यापारी वर्ग का यह भी दायित्व है कि वह गायों को सुरक्षा प्रदान करे, जिससे पर्याप्त दुग्ध तथा दुग्ध-उत्पाद प्राप्त हों। इन्हीं से समुचित स्वास्थ्य तथा बुद्धि प्राप्त हो सकती हैं, जो परम सत्य के ज्ञान के निमित्त सभ्यता को स्थापित रखने मेंं समर्थ हैं। श्रमिक वर्ग, जो न तो बुद्धिमान होता है न शक्तिमान, वह अन्य उच्चतर वर्गों की सेवा करके सहायता पहुँचा सकता है और उनके सहयोग से लाभान्वित हो सकता है। अतएव यह ब्रह्माण्ड भगवान् के परिप्रेक्ष्य में एक पूर्ण इकाई है। भगवान् के साथ इस सम्बन्ध के अभाव में सारा मानव समाज अस्त-व्यस्त रहता है, उसमें शान्ति तथा सम्पन्नता नहीं रहती। इसकी पुष्टि वेदों में हुई है—ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहूराजन्य: कृत:।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥