श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 5: समस्त कारणों के कारण  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक
भूर्लोक: कल्पित: पद्‍भ्यां भुवर्लोकोऽस्य नाभित: ।
हृदा स्वर्लोक उरसा महर्लोको महात्मन: ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
भू:—पाताल तक सारे अध:लोक; लोक:—लोक; कल्पित:—कल्पना किया गया या कहा गया; पद्भ्याम्—पाँवों से; भुव:—ऊर्ध्व; लोक:—लोक; अस्य—उसकी (भगवान् की); नाभित:—नाभि से; हृदा—हृदय से; स्वर्लोक:—देवताओं द्वारा निवासित लोक; उरसा—वक्षस्थल से; महर्लोक:—ऋषियों मुनियों से विभूषित लोक; महा-आत्मन:—भगवान् का ।.
 
अनुवाद
 
 पृथ्वी-तल तक सारे अधोलोक उनके पाँवों में स्थित हैं। भुवर्लोक इत्यादि मध्य लोक उनकी नाभि में स्थित हैं और इनसे भी उच्चतर लोक, जो देवताओं तथा सुसंस्कृत ऋषियों-मुनियों द्वारा निवसित हैं, वे भगवान् के वक्षस्थल में स्थित हैं।
 
तात्पर्य
 इस ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत चौदह लोक हैं। अधोलोक भूर्लोक कहलाते हैं, बीच के भुवर्लोक तथा ब्रह्माण्ड तक के सर्वोच्च लोक ब्रह्मलोक है, वहाँ तक के सारे ऊर्ध्वलोक
स्वर्लोक कहलाते हैं। ये सभी लोक भगवान् के शरीर में स्थित हैं। दूसरे शब्दों में, इस ब्रह्माण्ड के भीतर कोई ऐसा लोक नहीं है, जिसका सम्बन्ध भगवान् के साथ न हो।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥