श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 5: समस्त कारणों के कारण  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक
आत्मन् भावयसे तानी न पराभावयन् स्वयम् ।
आत्मशक्तिमवष्टभ्य ऊर्णनाभिरिवाक्लम: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
आत्मन् (आत्मनि)—अपने द्वारा; भावयसे—प्रकट करते हैं; तानि—वे सब; न—नहीं; पराभावयन्—पराजित होकर; स्वयम्—खुद, अपने आप; आत्म-शक्तिम्—आत्मनिर्भर शक्ति; अवष्टभ्य—नियुक्त होकर; ऊर्ण-नाभि:—मकड़ी; इव—सदृश; अक्लम:—बिना सहायता के ।.
 
अनुवाद
 
 जिस प्रकार मकड़ी अपने जाले को सरलता से उत्पन्न करती है और अन्यों के द्वारा पराजित हुए बिना अपनी सृजन-शक्ति प्रकट करती है, उसी प्रकार आप अपनी आत्म-निर्भर शक्ति को प्रयुक्त करके दूसरे से सहायता लिये बिना सृजन करते हैं।
 
तात्पर्य
 आत्मनिर्भरता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण सूर्य है। सूर्य को प्रकाशित होने के लिए किसी दूसरे तत्त्व की आवश्यकता नहीं पड़ती। प्रत्युत सूर्य ही समस्त प्रकाशमान वस्तुओं का सहायक बनता है, क्योंकि सूर्य के होने पर अन्य कोई प्रकाशमान वस्तु महत्त्वपूर्ण नहीं होती। नारद ने ब्रह्मा की स्थिति की तुलना उस मकड़ी की आत्म-निर्भरता से की है, जो अन्य किसी से सहायता लिये बिना अपनी लार के शक्तिशाली सृजन से अपना जाला बनाती है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥