श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 5: समस्त कारणों के कारण  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
एतन्मे पृच्छत: सर्वं सर्वज्ञ सकलेश्वर ।
विजानीहि यथैवेदमहं बुध्येऽनुशासित: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
एतत्—यह सब; मे—मुझको; पृच्छत:—उत्सुक, जिज्ञासु; सर्वम्—जो कुछ पूछा जाता है; सर्व-ज्ञ—सब कुछ जाननेवाला; सकल—सम्पूर्ण; ईश्वर—नियन्ता; विजानीहि—कृपा करके बतायें; यथा—जिस तरह; एव—वे हैं; इदम्—यह; अहम्—मैं; बुध्ये—समझ सकूँ; अनुशासित:—आपसे सीखकर ।.
 
अनुवाद
 
 हे पिता, आप सब कुछ जाननेवाले हैं और सबों के नियन्ता हैं। अतएव मैंने आपसे जितने सारे प्रश्न किये हैं, उन्हें कृपा करके बताइये, जिससे मैं आपके शिष्य के रूप में उन्हें समझ सकूँ।
 
तात्पर्य
 नारद मुनि द्वारा पूछे गये सारे प्रश्न सबों के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। अतएव उन्होंने ब्रह्माजी से प्रार्थना की कि वे इन्हें उपयुक्त समझें, जिससे ब्रह्म-सम्प्रदाय की परम्परा के अन्य सभी लोग बिना कठिनाई के उन्हें समझ सकें।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥