श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 6: पुरुष सूक्त की पुष्टि  »  श्लोक 10

 
श्लोक
पराभूतेरधर्मस्य तमसश्चापि पश्‍चिम: ।
नाड्यो नदनदीनां च गोत्राणामस्थिसंहति: ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
पराभूते:—उद्विग्नता का; अधर्मस्य—अनैतिकता का; तमस:—अज्ञान का; च—तथा; अपि—भी; पश्चिम:—पीठ; नाड्य:— नसों का; नद—बड़ी नदियों का; नदीनाम्—नालों का; च—भी; गोत्राणाम्—पर्वतों की; अस्थि—हड्डियाँ; संहति:— संकलन ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् की पीठ समस्त प्रकार की उद्विग्नता तथा अज्ञान एवं अनैतिकता का स्थान है। उनकी नसों से नदियाँ तथा नाले प्रवाहित होते हैं और उनकी हड्डियों पर बड़े-बड़े पहाड़ बने हैं।
 
तात्पर्य
 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की निराकार अवधारणा को खंडन करने के लिए यहाँ पर भगवान् के दिव्य शरीर की संरचना का क्रमबद्ध विश्लेषण दिया गया है। भगवान् के शरीर (विराट रूप) के प्राप्य वर्णन से स्पष्ट है कि भगवान् का स्वरूप सामान्य संसारी अवधारणा से भिन्न है। किसी भी दशा में वे निराकार नहीं हैं। चूँकि अज्ञान भगवान् का पृष्ठ भाग (पीठ) है, अतएव अल्पज्ञों का अज्ञान भी भगवान् की शारीरिक अवधारणा से पृथक् नहीं होता। चूँकि उनका शरीर प्रत्येक वस्तु का समग्र रूप है, अतएव कोई यह डींग नहीं हाँक सकता कि वे केवल
निर्विशेष हैं। इसके विपरीत, भगवान् के पूर्ण वर्णन से सिद्ध होता है कि वे एकसाथ साकार तथा निर्विशेष दोनों हैं। भगवान् का साकार रूप उनका मूल रूप है और उनका निर्विशेष प्रकाश उनके दिव्य शरीर का प्रतिबिम्ब मात्र है। जो लोग सामने से भगवान् का दर्शन करने का अवसर पाते हैं, वे ही भगवान् के साकार रूप का साक्षात्कार कर सकते हैं। किन्तु जो कुण्ठित हैं और इसलिए भगवान् के अज्ञान पक्ष की ओर रखे जाते हैं, अथवा जो भगवान् का दर्शन पीछे की ओर से करते हैं, वे उनके निर्विशेष रूप का ही साक्षात्कार कर सकते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥