श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 6: पुरुष सूक्त की पुष्टि  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक
सोऽमृतस्याभयस्येशो मर्त्यमन्नं यदत्यगात् ।
महिमैष ततो ब्रह्मन् पुरुषस्य दुरत्यय: ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह (भगवान्); अमृतस्य—अमरता का; अभयस्य—निर्भयता का; ईश:—नियन्ता; मर्त्यम्—मरणशील; अन्नम्—सकाम कर्म; यत्—जो; अत्यगात्—पार कर गया है; महिमा—यश; एष:—उसका; तत:—अतएव; ब्रह्मन्—हे ब्राह्मण नारद; पुरुषस्य—परम पुरुष का; दुरत्यय:—अमाप्य ।.
 
अनुवाद
 
 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अमरता तथा निर्भयता के नियन्त्रक हैं और वे मृत्यु तथा भौतिक जगत के सकाम कर्मों से परे हैं। हे नारद, हे ब्राह्मण, इसलिए परम पुरुष के यश का अनुमान लगा पाना कठिन है।
 
तात्पर्य
 भगवान् की अन्तरंगा शक्ति का दिव्य पचहत्तर प्रतिशत भगवान् का यश है, जिसका वर्णन पद्म पुराण (उत्तर खण्ड) में हुआ है। उसमें यह बताया गया है कि आध्यात्मिक आकाश भगवान् की अन्तरंगा शक्ति का पचहत्तर प्रतिशत है, जिसमें स्थित लोक भगवान् की बहिरंगा शक्ति से संरचित सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों के लोकों से कहीं अधिक विशाल हैं। चैतन्य-चरितामृत में भगवान् की बहिरंगा शक्ति के समस्त ब्रह्माण्डों की तुलना बाल्टी भर सरसों के बीजों से की गई है। सरसों का प्रत्येक बीज अपने में एक ब्रह्माण्ड जैसा है। इनमें से एक ब्रह्माण्ड में, जिसमें हम अब रह रहे हैं, लोकों की संख्या की गणना कर पाना मनुष्य की शक्ति के परे है, तो भला हम उन सारे ब्रह्माण्डों के विषय में कैसे सोच सकते हैं, जो बाल्टी भर सरसों के बीजों के तुल्य हैं? यही नहीं, आध्यात्मिक आकाश मेंं लोकों की संख्या भौतिक आकाश की तुलना में कम से कम तीन गुनी अधिक है। ऐसे लोक आध्यात्मिक होने के कारण भौतिक गुणों से परे होते हैं, अतएव वे केवल विशुद्ध सतोगुण से बने हुए होते हैं। इन लोकों में ब्रह्मानन्द का बोलबाला रहता है। इनमें से प्रत्येक शाश्वत, अविनाशी तथा भौतिक जगत में अनुभव किये जाने वाले सभी प्रकार के उन्माद से रहित होता है। इनमें से प्रत्येक लोक स्वत:प्रकाशित है और लाखों भौतिक सूर्यों के प्रकाश से (यदि हम अनुमान लगा सकें)—कहीं अधिक चकाचौंध वाला है। उन लोकों के निवासी जन्म, मृत्यु, जरा तथा रोग से मुक्त होते हैं और उन्हें हर वस्तु का पूर्ण ज्ञान होता है। वे सभी भगवद्भावना से युक्त होते हैं और भौतिक तृष्णाओं से रहित होते हैं। उन्हें उन परमेश्वर नारायण की दिव्य प्रेममयी सेवा के अतिरिक्त और कुछ नहीं करना होता, जो ऐसे वैकुण्ठ लोक के प्रमुख श्रीविग्रह हैं। वे मुक्तात्माएँ सामवेद के गीतों के गायन में निरन्तर व्यस्त रहती हैं (वेदै: साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगा:)। वे सब पाँचों उपनिषदों के साक्षात् रूप हैं। त्रिपाद-विभूति, जो भगवान् की अन्तरंगा शक्ति का ७५ प्रतिशत है, भगवान् का वह धाम है, जो भौतिक आकाश से बहुत परे है, किन्तु जब हम पाद-विभूति की बात करते हैं, जो भगवान् की बहिरंगा शक्ति का २५ प्रतिशत होता है, भौतिक जगत के गोलक को द्योतित करता है। पद्म पुराण में कहा गया है कि त्रिपाद विभूति का साम्राज्य शाश्वत है, किन्तु पाद-विभूति अनित्य है। इस दिव्य साम्राज्य (धाम) में भगवान् तथा उनके शाश्वत सेवकों के स्वरूप शाश्वत होते हैं और वे शुभ, अच्युत, आध्यात्मिक तथा चिर युवा रहते हैं। दूसरे शब्दों में, वहाँ पर जन्म, मृत्यु, जरा तथा रोग नहीं होते। यह शाश्वत स्थान दिव्य आनन्द, सौन्दर्य तथा सुख से पूर्ण रहता है। इसी तथ्य का समर्थन श्रीमद्भागवत के इस श्लोक से भी होता है और इसमें दिव्य प्रकृति को अमृत कहा गया है। जैसाकि वेदों में वर्णित है उतामृतत्त्वस्येशान:— परमेश्वर अमरत्व के स्वामी हैं। दूसरे शब्दों में, भगवान् अमर हैं और चूँकि वे अमरत्व के स्वामी हैं, अतएव वे अपने भक्तों को अमरत्व प्रदान कर सकते हैं। भगवद्गीता (८.१६) में भगवान् यह भी विश्वास दिलाते हैं कि जो भी उनके इस अमरत्व धाम को जाता है, वह फिर कभी तापमय मर्त्यलोक में नहीं लौटता। भगवान् उस संसारी स्वामी की तरह नहीं हैं, जो न तो कभी अपने अधीनस्थों के साथ समभाव से भोग करता है, न अमर होता है, न अपने अधीनस्थों को वह अमरत्वप्रदान कर सकता है। समस्त जीवों के नायक परमेश्वर अपने भक्तों को सारे गुण प्रदान कर सकते हैं, जिनमें अमरत्व तथा आध्यात्मिक आनन्द भी सम्मिलित हैं। भौतिक जगत में समस्त जीवों के हृदयों में सदैव चिन्ता या भय सवार रहता है, किन्तु भगवान् स्वयं परम निर्भय होने के कारण निर्भयता का यह गुण अपने शुद्ध भक्तों को भी प्रदान करते हैं। संसारी अस्तित्व स्वयं में एक प्रकार का भय होता है, क्योंकि सारे जीव जन्म, मृत्यु, जरा तथा रोग से सदा भयभीत रहते हैं। इस जगत में सदैव काल का प्रभाव बना रहता है, जिससे वस्तुएँ एक अवस्था से दूसरी अवस्था को प्राप्त होती हैं और जो जीव मूलत: अविकार होता है, वह समय के प्रभाव से काफी परिवर्तित हो जाता है। किन्तु शाश्वत काल के परिवर्तनशील प्रभाव भगवद्धाम में अनुपस्थित रहते हैं, अतएव यह समझना चाहिए कि उस पर काल का प्रभाव नहीं पड़ता, जिसके कारण वहाँ किसी प्रकार का भय नहीं रहता। भौतिक जगत में तथाकथित सुख मनुष्य के स्वकर्म का फल होता है। कोई मनुष्य अपने कठोर श्रम के बल पर धनवान बन सकता है और ऐसे अर्जित सुख की अवधि के विषय में सदैव भय तथा आशंका बनी रहती है। किन्तु भगवद्धाम में किसी को सुख प्राप्त करने के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता। सुख तो आत्मा का स्वभाव है, जैसाकि वेदान्त सूत्र में कहा गया है आनन्दमयोऽभ्यासात्—आत्मा स्वभाव से सुखमय है। आत्मा का यह सुख सदैव वर्धित होता रहता है, इस आनन्द के क्षीण होने का प्रश्न ही नहीं उठता। ऐसा अनन्य आध्यात्मिक आनन्द भौतिक ब्रह्माण्ड की परिधि में कहीं प्राप्य नहीं है, यहाँ तक कि जनलोक में या कि महर्लोक या सत्यलोक में भी नहीं, क्योंकि ब्रह्माजी भी सकाम कर्म तथा जन्म-मृत्यु के नियमों से बँधे हैं। इसीलिए यहाँ पर कहा गया है दुरत्यय: या दूसरे शब्दों में, भगवद्धाम के आध्यात्मिक सुख की कल्पना बड़े से बड़े ब्रह्मचारी या संन्यासी भी नहीं कर पाते, जो स्वर्ग से परे लोकों को प्राप्त करने के पात्र हैं। अथवा परमेश्वर इतने महान् हैं कि उनकी महानता की कल्पना बड़े-बड़े ब्रह्मचारी या संन्यासी तक नहीं कर पाते, किन्तु भगवत्कृपा से भगवान् के अनन्य भक्त इस सुख को सचमुच प्राप्त करते हैं।
 
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