श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 6: पुरुष सूक्त की पुष्टि  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक
यस्मादण्डं विराड् जज्ञे भूतेन्द्रियगुणात्मक: ।
तद् द्रव्यमत्यगाद् विश्वं गोभि: सूर्य इवातपन् ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
यस्मात्—जिससे; अण्डम्—ब्रह्माण्ड; विराट्—तथा विराट रूप; जज्ञे—प्रकट हुआ; भूत—तत्त्व; इन्द्रिय—इन्द्रियाँ; गुण- आत्मक:—गुणात्मक; तत् द्रव्यम्—ब्रह्माण्ड तथा विराट रूप आदि.; अत्यगात्—पार कर गया; विश्वम्—समस्त ब्रह्माण्डों को; गोभि:—किरणों से; सूर्य:—सूर्य; इव—सदृश; आतपन्—किरणों तथा ताप को वितरित किया ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् से सारे ब्रह्माण्ड तथा समस्त भौतिक तत्त्वों, गुणों एवं इन्द्रियों से युक्त विराट रूप उत्पन्न होते हैं। फिर भी वे ऐसे भौतिक प्राकट्यों से उसी तरह पृथक् रहते हैं जिस तरह सूर्य अपनी किरणों तथा ताप से पृथक् रहता है।
 
तात्पर्य
 पिछले श्लोक में परम सत्य को पुरुष या पुरुषोत्तम कहा गया है। परम पुरुष तो अपनी विभिन्न शक्तियों के कारण ईश्वर या परम नियंता होता है। भगवान् की भौतिक शक्ति का एकपाद विभूति प्राकट्य भगवान् की अनेक दासियों में से एक दासी की तरह है, जिसके प्रति भगवान् अधिक आकृष्ट नहीं होते, जिसे गीता में भिन्ना प्रकृति: कहा गया है। किन्तु त्रिपाद विभूति क्षेत्र भगवान् की शक्ति का शुद्ध आध्यात्मिक प्राकट्य होने के कारण एक प्रकार से उन्हें अधिक आकृष्ट करने वाला है। अतएव भगवान् भौतिक शक्ति को गर्भस्थ करके, भौतिक प्राकट्यों को उत्पन्न करते हैं और इस प्राकट्य में अपने को विश्व-रूप में विस्तारित करते हैं। अर्जुन को दिखाया गया विश्वरूप भगवान् का मूल रूप नहीं है। भगवान् का मूल रूप तो पुरुषोत्तम या साक्षात् कृष्ण का दिव्य रूप है। यहाँ पर बड़े सुन्दर ढंग से बताया गया है कि भगवान् सूर्य की भाँति प्रसार करते हैं। सूर्य अपने असह्य ताप तथा किरणों के द्वारा अपना विस्तार करता है फिर भी सूर्य ऐसी किरणों एवं ताप से सदा पृथक् रहता है। निर्विशेषवादी भगवान् की किरणों पर तो विचार करता है, लेकिन उसे भगवान् के यथार्य दिव्य नित्य रूप के विषय में कोई जानकारी नहीं होती, जो कृष्ण के नाम से जाना जाता है। अतएव, अपने परम साकार रूप में दो भुजाओं एवं बाँसुरी से युक्त कृष्ण निर्विशेषवादियों को भ्रमित करनेवाले हैं, क्योंकि वे भगवान् के विराट विश्व-रूप को ही देखने के आदी हैं। उन्हें ज्ञान होना चाहिए कि सूर्य की किरणें सूर्य के लिए गौण हैं, उसी तरह भगवान् का निर्विशेष विराट रूप भी साकार पुरुषोत्तम रूप से गौण है। ब्रह्म-संहिता (५.३७) द्वारा इस कथन की पुष्टि निम्न प्रकार से होती है—

आनन्द चिन्मयरसप्रतिभाविताभिस्ताभिर्य एव निजरूपतया कलाभि:।

गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूतो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥

“भगवान् गोविन्द, जो अपनी शारीरिक किरणों के द्वारा प्रत्येक व्यक्ति की इन्द्रियों को सजीव बनाते हैं, अपने दिव्य धाम गोलोक में निवास करते हैं। तो भी वे अपनी ह्लादिनी शक्ति के तुल्य प्रसन्न आध्यात्मिक किरणों के प्रसार से अपनी सृष्टि के कोने-कोने में उपस्थित रहते हैं। अतएव वे अपनी अचिन्त्य शक्ति के द्वारा एकसाथ साकार तथा निर्विशेष हैं, अथवा वे अद्वितीय हैं और भौतिक तथा आध्यात्मिक प्राकट्यों की विभिन्नता में पूर्ण एकता प्रदर्शित करते हैं। यद्यपि वे हर वस्तु से पृथक् हैं, फिर भी कोई वस्तु उनसे पृथक् नहीं है।”

 
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