श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 6: पुरुष सूक्त की पुष्टि  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
वस्तून्योषधय: स्‍नेहा रसलोहमृदो जलम् ।
ऋचो यजूंषि सामानि चातुर्होत्रं च सत्तम ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
वस्तूनि—पात्र; ओषधय:—अन्न; स्नेहा:—घी; रस-लोह-मृद:—शहद, सोना तथा मिट्टी; जलम्—जल; ऋच:—ऋग्वेद; यजूंषि—यजुर्वेद; सामानि—सामवेद; चातु:-होत्रम्—यज्ञ सम्पन्न करनेवाले चार व्यक्ति; च—ये सब; सत्तम—हे परम पवित्र ।.
 
अनुवाद
 
 यज्ञ की अन्य आवश्यकताएँ हैं—पात्र, अन्न, घी, शहद, सोना, मिट्टी, जल, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा यज्ञ सम्पन्न करानेवाले चार पुरोहित।
 
तात्पर्य
 यज्ञ को विधिवत् सम्पन्न करने के लिए कम से कम चार पटु पुरोहितों की आवश्यकता होती है—एक आहुति करनेवाला (होता), एक उच्चारण करने वाला (उद्गाता), एक अग्नि को पृथक् अग्नि की सहायता के बिना जलानेवाला (अध्वर्यु) तथा एक निरीक्षण करनेवाला (ब्रह्मा)। ऐसे यज्ञ प्रथम जीव ब्रह्मा के जन्म-काल से ही होते आये हैं और महाराज युधिष्ठिर के शासन-काल तक चलते रहे। किन्तु आज के कलह तथा भ्रष्टाचार के युग में ऐसे पटु ब्राह्मण पुरोहित अत्यन्त दुर्लभ हैं, अतएव इस युग में केवल भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन-यज्ञ की संस्तुति की गई है।

शास्त्रों का आदेश है—

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।

कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥