श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 6: पुरुष सूक्त की पुष्टि  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक
ततस्ते भ्रातर इमे प्रजानां पतयो नव ।
अयजन् व्यक्तमव्यक्तं पुरुषं सुसमाहिता: ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्; ते—तुम्हारे; भ्रातर:—भाई; इमे—ये; प्रजानाम्—प्राणियों के; पतय:—स्वामी; नव—नौ; अयजन्—यज्ञ किया; व्यक्तम्—प्रकट; अव्यक्तम्—अप्रकट; पुरुषम्—पुरुष को; सु-समाहिता:—उचित अनुष्ठानों से ।.
 
अनुवाद
 
 हे पुत्र, तत्पश्चात् तुम्हारे नौ भाइयों ने, जो प्रजापति हैं, व्यक्त तथा अव्यक्त दोनों प्रकार के पुरुषों को प्रसन्न करने के लिए समुचित अनुष्ठानों सहित यज्ञ सम्पन्न किया।
 
तात्पर्य
 व्यक्त पुरुषों में स्वर्ग के राजा इन्द्र तथा देवता जैसे उनके पार्षद आते हैं और अव्यक्त पुरुष में साक्षात् भगवान् आते हैं। व्यक्त पुरुष भौतिक कार्यों के नियन्त्रक हैं, जबकि अव्यक्त भगवान् दिव्य हैं और भौतिक व्योम की सीमा के परे हैं। इस कलियुग में व्यक्त देवता भी नहीं दिखते, क्योंकि अन्तरिक्ष-यात्रा पूर्ण रूप से बन्द है। अतएव आधुनिक मनुष्य की ढकी हुई आँखों के लिए शक्तिशाली देवता तथा भगवान् दोनों ही अव्यक्त बने हुए हैं। आधुनिक व्यक्ति प्रत्येक वस्तु को अपनी आँखों से देखना चाहते हैं, भले ही वे पर्याप्त रुप से दक्ष न हों। फलस्वरूप वे देवताओं में या परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते। उन्हें चाहिए कि प्रामाणिक शास्त्रों के पृष्ठों को पलटें और मात्र अपनी अक्षम आँखों पर ही विश्वास न करें। आज भी, ईश्वर-प्रेम रूपी अंजन लगा कर दक्ष आँखों से ईश्वर के दर्शन किये जा सकते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥