श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 6: पुरुष सूक्त की पुष्टि  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक
यस्यावतारकर्माणि गायन्ति ह्यस्मदादय: ।
न यं विदन्ति तत्त्वेन तस्मै भगवते नम: ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
यस्य—जिसका; अवतार—अवतार; कर्माणि—कार्यकलाप; गायन्ति—महिमा का गायन करते हैं; हि—निस्सन्देह; अस्मत्- आदय:—हम जैसे व्यक्ति; न—नहीं; यम्—जिसको; विदन्ति—जानते हैं; तत्त्वेन—शत-प्रतिशत उसी रूप में; तस्मै—उन; भगवते—भगवान् श्रीकृष्ण को; नम:—नमस्कार करता हूँ ।.
 
अनुवाद
 
 हम उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को सादर प्रणाम करते हैं, जिनके अवतारों तथा कार्य- कलापों का गायन हमारे द्वारा उनके महिमा-मण्डन के लिए किया जाता है, यद्यपि वे अपने यथार्थ रूप में बड़ी कठिनाई से ही जाने जा सकते हैं।
 
तात्पर्य
 यह कहा जाता है कि भगवान् के दिव्य नाम, रूप, गुण, लीलाओं, साज-समान, व्यक्तित्व आदि की अनुभूति संभवत: स्थूल भौतिकतावादी इन्द्रियों द्वारा नहीं की जा सकती। किन्तु जब इन्द्रियों को श्रवण, कीर्तन, स्मरण तथा श्रीविग्रह के चरणकमलों की पूजा आदि की प्रक्रिया के द्वारा शुद्ध कर लिया जाता है, तो भगवान् भक्तिमय सेवा की गुणता के अनुसार अपने आपको प्रकट करते हैं (ये यथा मां प्रपद्यन्ते)। मनुष्य को भगवान् से यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वे हमारे आदेश पूरक एजेण्ट की भाँति हैं, जो हमारे चाहते ही हमारे समक्ष उपस्थित हो जायेगा। हमें ब्रह्मा, नारद तथा अन्य अधिकारिक शिष्य परम्परा के हमारे पूर्वगामियों द्वारा दिखलाए गये पथ का अनुगमन करते हुए निर्दिष्ट भक्ति-कार्यों को सम्पन्न करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। ज्यों-ज्यों प्रामाणिक भक्ति से इन्द्रियाँ क्रमश: शुद्ध होती जाती हैं, त्यों-त्यों भगवान् भक्त की आध्यात्मिक प्रगति के अनुसार अपनी सत्ता का उद्धाटन करते चलते हैं। किन्तु जो भक्ति सम्प्रदाय में नहीं आया है, वह केवल आकलनों और दार्शनिक अनुमानों से उनकी अनुभूति नहीं कर सकता है। ऐसा कठोर-कर्मी भले ही श्रोताओं के समक्ष शब्दजाल प्रस्तुत कर दे, किन्तु वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को उनके साकार रूप में कभी नहीं जान सकता। भगवान् ने भगवद्गीता में स्पष्ट कहा है कि कोई भी उन्हें केवल भक्ति के द्वारा जान सकता है। कोई भी व्यक्ति किसी आड़बर पूर्ण भौतिक चुनौती के द्वारा भगवान को नहीं जान सकता, लेकिन विनीत भक्त अपने सच्चे भक्ति-कार्यों से भगवान् को प्रसन्न कर सकता है। इस तरह भगवान् भक्त के समक्ष, एक अनुपात में ही प्रगट होते हैं। अतएव ब्रह्माजी प्रामाणिक गुरु के रूप में सादर नमस्कार करते हैं और हमें भी श्रवण तथा कीर्तन की विधि का अनुसरण करने का उपदेश देते हैं। केवल इसी विधि से या भगवान् के अवतार के कार्यकलापों की महिमा के श्रवण तथा कीर्तन से मनुष्य अपने अन्त:करण में भगवान् की सत्ता का दर्शन कर सकता है। इस विषय पर श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध में निम्नलिखित श्लोक के प्रसंग पर हम पहले ही व्याख्या कर चुके हैं— तच्छ्रद्दधाना मुनयो ज्ञानवैराग्ययुक्तया।

पश्यन्त्यात्मनि चात्मानं भक्त्या श्रुतगृहीतया ॥

(भागवत१.२.१२) निष्कर्ष यह है कि भगवान् को किसी भी विधि से पूरी तरह नहीं जाना जा सकता, किन्तु वे श्रवण, कीर्तन आदि की भक्ति-विधि द्वारा अंशत: देखे तथा अनुभव किये जा सकते हैं।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥