श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 6: पुरुष सूक्त की पुष्टि  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक
स एष आद्य: पुरुष: कल्पे कल्पे सृजत्यज: ।
आत्मात्मन्यात्मनात्मानं स संयच्छति पाति च ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; एष:—वही; आद्य:—आदि भगवान्; पुरुष:—महाविष्णु अवतार, गोविन्द, श्रीकृष्ण के पूर्णांश; कल्पे कल्पे— प्रत्येक कल्प में; सृजति—सृष्टि करता है; अज:—अजन्मा; आत्मा—स्वयं; आत्मनि—स्वयं में; आत्मना—स्वयं से; आत्मानम्—स्वयं को; स:—वह; संयच्छति—लीन कर लेता है; पाति—पालन करता है; च—भी ।.
 
अनुवाद
 
 वे परम आदि भगवान् श्रीकृष्ण, प्रथम अवतार महाविष्णु के रूप में अपना विस्तार करके इस व्यक्त जगत की सृष्टि करते हैं, किन्तु वे अजन्मा रहते हैं। फिर भी सृष्टि उन्हीं से है, भौतिक पदार्थ तथा अभिव्यक्ति भी वे ही हैं। वे कुछ काल तक उनका पालन करते हैं और फिर उन्हें अपने में समाहित कर लेते हैं।
 
तात्पर्य
 यह सृष्टि भगवान् से अभिन्न है, फिर भी वे सृष्टि में नहीं हैं। भगवद्गीता (९.४) में इसकी व्याख्या इस प्रकार की गई है—

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।

मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित: ॥

परम सत्य की निर्विशेष अवधारणा भी भगवान् का एक रूप है, जिसे अव्यक्त-मूर्ति कहते हैं। मूर्ति का अर्थ है ‘रूप’, लेकिन चूँकि हमारी सीमित इन्द्रियाँ उनके निर्विशेष स्वरूप का वर्णन नहीं कर पातीं, अतएव वे अव्यक्तमूर्ति हैं और इसी अव्यक्त रूप में सारी सृष्टि स्थित है। अथवा दूसरे शब्दों में, सारी सृष्टि ही साक्षात् भगवान् है और यह सृष्टि उनसे अभिन्न भी है, किन्तु साथ ही आदि भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में वे सृजित जगत से पृथक् हैं। निर्विशेषवादी भगवान् के निर्विशेष रूप पर बल देते हैं और भगवान् के आदि व्यक्तित्व पर विश्वास नहीं करते, किन्तु वैष्णवजन भगवान् के आदि रूप को स्वीकार करते हैं, जिनका निर्विशेष रूप अनेक स्वरूपों में से केवल एक है। भगवान् की साकार तथा निर्विशेष अवधारणाएँ साथ-साथ पाई जाती हैं और भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत में तथा अन्य वैदिक शास्त्रों में इस तथ्य का स्पष्ट वर्णन हुआ है। यह विचार मानवबुद्धि के लिए अकल्पनीय है, अतएव इसे शास्त्रों के प्रमाण के आधार पर स्वीकार कर लेना चाहिए। इसकी व्यावहारिक अनुभूति तो भक्ति की प्रगति होने पर ही सम्भव है, किसी मानसिक चिन्तन या शुष्क तर्क के आधार पर नहीं। निर्विशेषवादी अधिकतर शुष्क तर्क पर आश्रित रहते हैं, अतएव वे आदि भगवान् श्रीकृष्ण के विषय में सदैव अन्धकार में रहते हैं। उनकी कृष्ण-विषयक अवधारणा स्पष्ट नहीं हो पाती, यद्यपि यह सारे वैदिक शास्त्रों में स्पष्ट मिलती है। अल्पज्ञान से भगवान् के आदि साकार रूप का अस्तित्व समझ में नहीं आ सकता, क्योंकि भगवान् का सभी वस्तुओं मेंं विस्तार है। यह अर्पूणता न्यूनाधिक इस भौतिक धारणा के कारण है कि जो वस्तु अपने अंशों में वितरित हो जाती है, वह अपने आदि (मूल) रूप में विद्यमान नहीं रह सकती।

आदि भगवान् (आद्य:) गोविन्द, महाविष्णु अवतार के रूप में, अपना विस्तार करते हैं और अपने ही द्वारा उत्पन्न किये गये कारणार्णव में विश्राम करते हैं। ब्रह्म-संहिता (५.४७) में इसकी पुष्टि इस प्रकार हुई है—

य: कारणार्णवजले भजति स्म योग- निद्रामनन्तजगदण्डसरोमकूप: आधारशक्तिमवलम्ब्य परां स्वमूर्तिं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥

ब्रह्म-संहिता में ब्रह्माजी कहते हैं “मैं आदि भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ जो अपने पूर्णांश महाविष्णु के रुप में कारणार्णव में शयन करते हैं और जिनके दिव्य शरीर के रोम-कूपों से समस्त ब्रह्माण्ड उत्पन्न होते हैं और जो शाश्वत योगनिद्रा ग्रहण किये रहते हैं।”

अतएव ये महाविष्णु इस सृष्टि के प्रथम अवतार हैं और उन्हीं से सारे ब्रह्माण्ड उत्पन्न होते हैं तथा एक-एक करके सारी भौतिक अभिव्यक्तियाँ उत्पन्न होती हैं। कारणार्णव की उत्पत्ति भगवान् द्वारा महत् तत्त्व के रूप में की जाती है, जो आध्यात्मिक आकाश में बादल के रूप में होता है और उनकी विभिन्न अभिव्यक्तियों में से केवल एक भाग है। आध्यात्मिक आकाश उनकी व्यक्तिगत किरणों का विस्तार है और वे महत् तत्त्व बादल भी हैं। वे लेटे रहते हैं और अपनी श्वास से ब्रह्माण्डों को उत्पन्न करते हैं और फिर गर्भोदकशायी विष्णु के रूप में, प्रत्येक ब्रह्माण्ड में प्रवेश करके, उसके पालन हेतु ब्रह्मा, शिव तथा अन्य अनेक देवताओं की सृष्टि करते हैं तथा अन्त में इन सबों को अपने शरीर में समाहित कर लेते हैं, जैसी कि भगवद्गीता (९.७) में पुष्टि हुई है—

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।

कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥

“हे कुन्ती-पुत्र! जब कल्प अर्थात् ब्रह्मा की आयु समाप्त होती है, तो सारी सृजित अभिव्यक्तियाँ मेरी प्रकृति अर्थात् शक्ति में प्रवेश कर जाती हैं और जब मैं पुन: इच्छा करता हूँ तो पुन: वही सृष्टि मेरी आत्म-शक्ति से प्रकट होती है।”

निष्कर्ष यह है कि यह सब भगवान् की अचिन्त्य आत्मशक्तियों का प्रदर्शन मात्र है, जिसके विषय में किसी को भी पूरी जानकारी नहीं हो सकती। हम इस बात को पहले भी बता चुके हैं।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥