श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक
ब्रह्मोवाच
यत्रोद्यत: क्षितितलोद्धरणाय बिभ्रत्
क्रौडीं तनुं सकलयज्ञमयीमनन्त: ।
अन्तर्महार्णव उपागतमादिदैत्यं
तं दंष्ट्रयाद्रिमिव वज्रधरो ददार ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
ब्रह्मा उवाच—ब्रह्माजी ने कहा; यत्र—उस समय (जब); उद्यत:—तत्पर; क्षिति-तल—पृथ्वीलोक के; उद्धरणाय—उठाने के लिए; बिभ्रत्—धारण किया; क्रौडीम्—लीलाएँ; तनुम्—रूप; सकल—समग्र; यज्ञ-मयीम्—यज्ञों से युक्त; अनन्त:—असीम; अन्तर्—ब्रह्माण्ड के भीतर; महा-अर्णवे—विशाल गर्भ सागर में; उपागतम्—पहुँचकर; आदि—प्रथम; दैत्यम्—असुर को; तम्—उस; दंष्ट्रया—दाढ़ से; अद्रिम्—उड़ते पर्वत; इव—सदृश; वज्र-धर:—वज्रों को धारण करने वाला; ददार—छेद दिया ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्माजी ने कहा : जब अनन्त शक्तिशाली भगवान् ने लीला के रूप में ब्रह्माण्ड के गर्भोदक नामक महासागर में डूबी हुई पृथ्वी को ऊपर उठाने के लिए वराह का रूप धारण किया, तो सबसे पहले एक असुर (हिरण्याक्ष) प्रकट हुआ। भगवान् ने उसे अपने अगले दाँत से विदीर्ण कर दिया।
 
तात्पर्य
 सृष्टि के प्रारम्भ से ही ब्रह्माण्डों के लोकों में, प्रमुख रूप से असुर तथा देवता अर्थात् वैष्णव—जीवों की ये दो श्रेणियाँ रही हैं। इस ब्रह्माण्ड के प्रथम देवता ब्रह्माजी हैं और हिरण्याक्ष इसका प्रथम असुर है। कतिपय निश्चित परिस्थितियों के अन्तर्गत ही सभी लोक वायु में भारहीन गेंद के समान तैरते हैं और ज्योंही ये परिस्थितियाँ विचलित होती हैं, ये लोक आधे ब्रह्माण्ड में व्याप्त गर्भोदक सागर में गिर पड़ते हैं। दूसरे आधे गोलार्द्ध में जो गोल गुंबद के रूप में है असंख्य लोकान्तर प्रणाली स्थित हैं। भारहीन वायु में लोकों का तैरना गोलकों की भीतरी संरचना के कारण है। आजकल तेल प्राप्त करने के लिए जिस प्रकार पृथ्वी के गर्भ का वेधन किया जाता है, वह आधुनिक असुरों द्वारा एक प्रकार का उत्पात है, जिससे पृथ्वी का तैरना (संतरण) अत्यन्त हानिकारक रूप में विचलित हो सकता है। ऐसा ही उत्पात पहले हिरण्याक्ष (जो स्वर्णदस्यु था) के समय उत्पन्न हुआ था जिससे पृथ्वी भारहीन स्थिति से निकल गई थीं और गर्भोदक सागर में गिर गई थी। फलत: समग्र भौतिक सृष्टि के पालनहार के रुप में भगवान् ने उपयुक्त थूथनी वाले विशाल शूकर का रूप धारण करके पृथ्वी को गर्भोदक सागर से बाहर निकाला। परम वैष्णव कवि श्रीजयदेव गोस्वामी का गीत है— वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना, शशिनि कलंककलेव निमग्ना।

केशव धृतशूकररूप, जय जगदीश हरे ॥

“हे केशव! हे शूकर रूप धारण करने वाले परमेश्वर! हे भगवान्! पृथ्वी आपकी दाढ़ों पर स्थित थी और वह कलंक युक्त चन्द्रमा की भाँति प्रतीत हो रही थी।”

भगवान् के अवतार का ऐसा लक्षण होता है। भगवान् का अवतार कुछ मनचले लोगों का मनगढं़त विचार नहीं, जो अपनी कल्पना से ही कोई अवतार उत्पन्न कर लेते है। भगवान् का अवतार कुछ असाधारण परिस्थितियों में होता है, जैसे ऊपर उल्लेख हुआ है और अवतार ऐसे-ऐसे कार्य सम्पन्न करता है, जिसकी कल्पना कर पाना लघु मानव मस्तिष्क के लिए सम्भव नहीं है। आजकल के सस्ते अवतार स्रष्टाओं को भगवान् के वास्तविक विराट शूकर अवतार से, जिसमें पृथ्वी लोक को उठाने के लिए उपयुक्त थूथन थी, शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।

जब भगवान् पृथ्वी उठाने के लिए प्रकट हुए तो हिरण्याक्ष ने उनके इस योजनाबद्ध कार्य में बाधा डालनी चाही, फलत: भगवान् ने उसे अपने लम्बे दांढ़ से बेध कर मार डाला। श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार हिरण्याक्ष का वध भगवान् के हाथों से हुआ। उनका कथन है कि पहले हाथों से मारने के बाद भगवान् ने उसे अपने लम्बे दांढ़ से बेध डाला। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने इस कथन की पुष्टि की है।

 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥