श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
सत्रे ममास भगवान् हयशीरषाथो
साक्षात् स यज्ञपुरुषस्तपनीयवर्ण: ।
छन्दोमयो मखमयोऽखिलदेवतात्मा
वाचो बभूवुरुशती: श्वसतोऽस्य नस्त: ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
सत्रे—यज्ञोत्सव में; मम—मेरे; आस—प्रकट हुए; भगवान्—श्रीभगवान्; हय-शीरषा—घोड़े का सिर धारण करके; अथ—इस प्रकार; साक्षात्—प्रत्यक्ष; स:—वह; यज्ञ-पुरुष:—ऐसा पुरुष जो यज्ञ सम्पन्न करने से प्रसन्न होता है; तपनीय—सुनहले; वर्ण:—रंग; छन्द:-मय:—साक्षात् वैदिक स्तोत्र; मख-मय:—साक्षात् यज्ञ; अखिल—जो कुछ सम्भव है, वह सब; देवता- आत्मा—देवताओं की आत्मा; वाच:—वाणी; बभूवु:—सुने जाते हैं; उशती:—कानों को अत्यन्त मधुर लगने वाले; श्वसत:— साँस लेते हुए; अस्य—इसके; नस्त:—नथुनों से ।.
 
अनुवाद
 
 मेरे (ब्रह्मा) द्वारा सम्पन्न यज्ञ में भगवान् हयग्रीव अवतार के रूप में प्रकट हुए। वे साक्षात् यज्ञ हैं और उनके शरीर का रंग सुनहला है। वे साक्षात् वेद भी हैं और समस्त देवताओं के परमात्मा हैं। जब उन्होंने श्वास ली, तो उनके नथुनों से समस्त मधुरवैदिक स्तोत्रों की ध्वनियाँ प्रकट हुईं।
 
तात्पर्य
 वैदिक स्तोत्र प्राय: उन कर्मियों के लिए हैं, जो यज्ञ करते हैं और फल प्राप्ति की अभिलाषा से देवताओं को भी प्रसन्न करना चाहते हैं। किन्तु भगवान् साक्षात् यज्ञ तथा वैदिक स्तोत्र हैं। अत: जो भगवान् का प्रत्यक्ष भक्त होता है उससे यज्ञ सम्पन्न करने तथा देवताओं को प्रसन्न करने के कार्य स्वत: सम्पन्न हो जाते हैं। भगवान् के भक्त भले ही कोई यज्ञ न करें या वैदिक आदेशों के अनुसार किसी देवता को प्रसन्न न करें, किन्तु फिर भी वे कर्मियों अथवा विभिन्न देवों के उपासकों से उच्चतर पद पर रहते हैं।
 
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