श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक
नार्थो बलेरयमुरुक्रमपादशौच-
माप: शिखाधृतवतो विबुधाधिपत्यम् ।
यो वै प्रतिश्रुतमृते न चिकीर्षदन्य-
दात्मानमङ्ग मनसा हरयेऽभिमेने ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
न—कभी नहीं; अर्थ:—की तुलना में किसी महत्त्व का; बले:—शक्ति का; अयम्—यह; उरुक्रम-पाद-शौचम्—श्रीभगवान् के पादप्रक्षालन से प्राप्त; आप:—जल; शिखा-धृतवत:—सिर के ऊपर धारण करने वाले का; विबुध-अधिपत्यम्—देवों के साम्राज्य के ऊपर प्रमुखता; य:—जो; वै—निश्चय ही; प्रतिश्रुतम्—दिया गया वचन; ऋते न—उसके अतिरिक्त; चिकीर्षत्— प्रयास किया गया; अन्यत्—अन्य कुछ; आत्मानम्—अपना शरीर भी; अङ्ग—हे नारद; मनसा—मन से; हरये—हरि के प्रति; अभिमेने—समर्पित ।.
 
अनुवाद
 
 अपने सिर पर भगवान् के कमल-पाद प्रक्षालित जल को धारण करने वाले बलि महाराज ने अपने गुरु द्वारा मना किये जाने पर भी अपने वचन के अतिरिक्त मन में अन्य कुछ धारण नहीं किया। राजा ने भगवान् के तीसरे पग को पूरा करने के लिए अपना शरीर समर्पित कर दिया। ऐसे महापुरुष के लिए अपने बाहुबल से जीते गये स्वर्ग के साम्राज्य का भी कोई महत्व नहीं था।
 
तात्पर्य
 बलि महाराज को इतना बड़ा भौतिक त्याग करने के बदले में भगवान् की दिव्य कृपा प्राप्त करने से वैकुण्ठ लोक में स्थान प्राप्त हुआ था जहाँ शाश्वत भोग की उतनी ही अथवा उससे भी अधिक सुविधाएँ उपलब्ध थीं। अत: बाहुबल से जीते गये स्वर्ग के साम्राज्य को त्याग करके, उन्होंने कुछ खोया नहीं था। दूसरे शब्दों में, जब भगवान् किसी की गाढ़ी कमाई को छीन कर बदले में शाश्वत जीवन के लिए अपनी दिव्य भक्ति, आनन्द तथा ज्ञान प्रदान करते हैं, तो इसे ऐसे शुद्ध भक्त पर भगवान् की विशेष कृपा समझनी चाहिए।

भौतिक सम्पत्ति, चाहे कितनी ही मोहक क्यों न हो, कभी स्थायी नहीं हो सकती। अत: मनुष्य को चाहिए कि स्वेच्छा से ऐसी सम्पत्ति का परित्याग कर दे, अन्यथा इस शरीर का त्याग करते समय इस सारी सम्पत्ति को छोडऩा ही पड़ता है। बुद्धिमान मनुष्य जानता है कि समस्त भौतिक सम्पत्ति नाशवान है और इसका सर्वोत्तम उपयोग है कि इसे भगवान् की सेवा में अर्पित कर दिया जाय जिससे भगवान् प्रसन्न होकर उसे अपने परम धाम में स्थायी निवास दे सकें।

भगवद्गीता (१५.५-६) में परम धाम की व्याख्या भगवान् ने इस प्रकार की है— निर्माणमोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामा:।

द्वन्द्वैर्विमुक्ता: सुखदु:खसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढा: पदमव्ययं तत् ॥

न तद्भासयते सूर्यो न शशांको न पावक:।

यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥

जिस मनुष्य के पास इस जगत में घर, भूमि, सन्तान, समाज, मित्रता तथा सम्पत्ति के रूप में आवश्यकता से अधिक जितना होता है, वह सब थोड़े समय के लिए उसके पास रहता है। कोई भी माया द्वारा उत्पन्न इस भ्रामक सामग्री को स्थायी रूप में नहीं रख सकता। ऐसा मालिक आत्म- साक्षात्कार के विषय में अत्यधिक मोहग्रस्त रहता है, अत: मनुष्य के पास या तो बिल्कुल कम हो या कुछ न हो जिससे वह बनावटी प्रतिष्ठा से दूर रह सके। हम इस जगत में तीनों गुणों से संसर्ग के कारण कलुषित रहते हैं। अत: जो कोई जितना ही इस क्षणिक सम्पत्ति के बजाय भगवद्भक्ति के द्वारा आध्यात्मिक उन्नति करता है, वह उतना ही भौतिक मोहासक्ति से मुक्त रहता है। जीवन की इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को अपने आध्यात्मिक अस्तित्व तथा इसके स्थायी प्रभावों के विषय में पूरा विश्वास होना चाहिए। स्व-अस्तित्व के स्थायित्व के विषय में सही ज्ञान प्राप्त करने के लिए स्वेच्छा से कम रखने या जीवन निर्वाह की आवश्यकता पूरी करने के लिए रखना चाहिए। मनुष्य को कृत्रिम आवश्यकताएँ न उत्पन्न करके न्यूनतम से संतुष्ट रहना चाहिए। कृत्रिम आवश्यकताएँ इन्द्रियों के कार्यकलाप हैं। आधुनिक सभ्यता की प्रगति इन्हीं इन्द्रियों के कार्यकलापों पर आधारित है अथवा दूसरे शब्दों में, यह सभ्यता इन्द्रिय-तृप्ति की सभ्यता है। पूर्ण सभ्यता तो आत्मा की सभ्यता है। इन्द्रिय-तुष्टि चाहने वाला सुसंस्कृत मनुष्य पशुओं के तुल्य है, क्योंकि पशु इन्द्रियों के कार्यकलापों से ऊपर नहीं उठ सकते।

इन्द्रियों से ऊपर मन है। मानसिक चिन्तन की सभ्यता भी पूर्ण नहीं, क्योंकि मन के ऊपर बुद्धि है और भगवद्गीता हमें बौद्धिक सभ्यता की जानकारी देती है। वैदिक साहित्य में मानवीय सभ्यता की अनेक दिशाएँ बताई गई हैं जिसमें इन्द्रिय, मन, बुद्धि तथा आत्मा की सभ्यताएँ सम्मिलित हैं। भगवद्गीता में मूलत: मनुष्य की बुद्धि का विवरण मिलता है, जिससे वह क्रमश: आत्मा की सभ्यता की ओर अग्रसर होता है। श्रीमद्भागवत तो आत्मा से सम्बद्ध विषय की पूर्ण मानवीय सभ्यता है। जैसे ही मनुष्य आत्मा की सभ्यता के पद तक उठ जाता है, वह ईश्वर के राज्य में जाने के योग्य बन जाता है, जिसका वर्णन भगवद्गीता के उपर्युक्त श्लोकों में मिलता है।

ईश्वर के साम्राज्य की प्रारम्भिक जानकारी से हमें पता लगता है कि वहाँ सूर्य, चन्द्र या बिजली की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन अंधकार से युक्त भौतिक जगत में इनकी आवश्यकता पड़ती है। दूसरे यह कि जो भी आत्मा की सभ्यता अर्थात् भक्तियोग की विधि से उस साम्राज्य तक पहुँचता है उसको जीवन की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त हो जाती है। तब मनुष्य आत्मा में स्थायी रूप से स्थित हो जाता है और उसे भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति का पूरा-पूरा ज्ञान हो जाता है। बलि महाराज ने अपनी सारी भौतिक सम्पत्ति देकर बदले में आत्मा की सभ्यता स्वीकार की और इस प्रकार वे भगवान् के साम्राज्य में पहुँचने के योग्य हो सके। स्वर्ग का साम्राज्य, जिसे उन्होंने अपनी भौतिक शक्ति के बल से प्राप्त किया था, ईश्वर के साम्राज्य के समक्ष तुच्छ था।

जो लोग इन्द्रिय-तुष्टि के लिए बनी भौतिक सभ्यता के सुख-साधनों को प्राप्त कर चुके हैं, उन्हें बलि महाराज के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए भगवद्धाम प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए जिन्होंने अपने अर्जित भौतिक समृद्धि के बदले में भक्तियोग की विधि स्वीकार की जिसकी संस्तुति भगवद्गीता में है और विस्तृत व्याख्या श्रीमद्भागवत में है।

 
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