श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक
जातो रुचेरजनयत् सुयमान् सुयज्ञ
आकूतिसूनुरमरानथ दक्षिणायाम् ।
लोकत्रयस्य महतीमहरद् यदार्तिं
स्वायम्भुवेन मनुना हरिरित्यनूक्त: ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
जात:—उत्पन्न हुआ; रुचे:—प्रजापति की पत्नी के; अजनयत्—जन्म हुआ; सुयमान्—सुयम इत्यादि; सुयज्ञ:—सुयज्ञ; आकूति-सूनु:—आकूति का पुत्र; अमरान्—देवता; अथ—इस प्रकार; दक्षिणायाम्—दक्षिणा नामक पत्नी से; लोक—लोक; त्रयस्य—तीनों का; महतीम्—अति विशाल; अहरत्—कम किया; यत्—वे सब; आर्तिम्—क्लेश; स्वायम्भुवेन—स्वायंभुव मनु द्वारा; मनुना—मनुष्यों के पिता द्वारा; हरि:—हरि; इति—इस प्रकार; अनूक्त:—नाम रखा ।.
 
अनुवाद
 
 सर्वप्रथम प्रजापति की पत्नी आकूति के गर्भ से सुयज्ञ उत्पन्न हुआ; फिर सुयज्ञ ने अपनी पत्नी दक्षिणा से सुयम इत्यादि देवताओं को उत्पन्न किया। सुयज्ञ ने इन्द्रदेव के रूप में तीनों लोकों के महान् क्लेश कम कर दिए थे, फलत: मानवमात्र के परम पिता स्वायंभुव मनु ने उसे हरि नाम से पुकारा।
 
तात्पर्य
 मनमौजी अल्पज्ञ पुरुष नये-नये अवैधानिक अवतारों की खोज करते रहते हैं। इनसे बचने के लिए धर्मग्रन्थों में प्रामाणिक अवतार के पिता का नाम भी दिया रहता है। फलत: यदि शास्त्रों में किसी अवतार के पिता का तथा प्रकट होने वाले ग्राम या स्थान का उल्लेख नहीं है, तो उसे भगवान् का अवतार नहीं माना जा सकता। भागवत-पुराण में कल्कि अवतार के पिता तथा जहाँ अवतार होगा उस ग्राम का नाम निर्देशित है। फलत: कोई भी बुद्धिमान पुरुष किसी सस्ते अवतार को शास्त्रों को देखे बिना स्वीकार नहीं करेगा।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥