श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
चक्रं च दिक्ष्वविहतं दशसु स्वतेजो
मन्वन्तरेषु मनुवंशधरो बिभर्ति ।
दुष्टेषु राजसु दमं व्यदधात् स्वकीर्तिं
सत्ये त्रिपृष्ठ उशतीं प्रथयंश्चरित्रै: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
चक्रम्—भगवान् का सुदर्शन चक्र; च—भी; दिक्षु—समस्त दिशाओं में; अविहतम्—किसी रोकटोक के बिना; दशसु—दसों दिशाएँ; स्व-तेज:—व्यक्तिगत पराक्रम; मन्वन्तरेषु—मनु के विभिन्न अवतारों में; मनु-वंश-धर:—मनु-वंश के वंशज रूप में; बिभर्ति—शासन करता है; दुष्टेषु—दुष्टों पर; राजसु—उस प्रकार के राजाओं पर; दमम्—उत्पीडऩ; व्यदधात्—सम्पन्न किया; स्व-कीर्तिम्—अपना यश; सत्ये—सत्यलोक में; त्रि-पृष्ठे—तीनों लोकों में; उशतीम्—महिमामय; प्रथयन्—स्थापित; चरित्रै:— गुणों द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने मनु-अवतार लिया और वे मनुवंश के वंशज बन गये। उन्होंने अपने शक्तिशाली सुदर्शन चक्र से दुष्ट राजाओं का दमन करके उन पर शासन किया। समस्त परिस्थितियों में अबाध रहते हुए, उनका शासन तीनों लोकों तथा ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च सत्यलोक तक फैला था और उनकी महिमामयी कीर्ति से मंडित था।
 
तात्पर्य
 प्रथम स्कंध में मनु के अवतारों की व्याख्या की जा चुकी है। ब्रह्मा के एक दिन में एक-

एक करके चौदह मनु बदलते हैं। इस प्रकार से ब्रह्मा के एक मास में ४२० मनु और एक वर्ष में ५,०४० मनु होते हैं। अपनी गणना के अनुसार, ब्रह्माजी १०० वर्ष तक जीवित रहते हैं, अत: एक ब्रह्मा की जीवन अवधि में ५,०४,००० मनु होते हैं। ऐसे ब्रह्मा असंख्य हैं और वे महाविष्णु के एक उच्छ्वास की अवधि तक जीवित रहते हैं। इस प्रकार हम कल्पना कर सकते हैं कि समस्त संसारों में, जो भगवान् के चतुर्थांश शक्ति के ही बराबर होते हैं, भगवान् के अवतार कैसे कार्य करते हैं।

मन्वन्तर अवतार चक्रधारी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के ही समान शक्ति से विभिन्न लोकों के दुष्ट शासकों को दण्डित करता है। मन्वन्तर अवतार भगवान् की दिव्य महिमाओं का प्रसार करते हैं।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥