श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक
धन्वन्तरिश्च भगवान् स्वयमेव कीर्ति-
र्नाम्ना नृणां पुरुरुजां रुज आशु हन्ति ।
यज्ञे च भागममृतायुरवावरुन्ध
आयुष्यवेदमनुशास्त्यवतीर्य लोके ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
धन्वन्तरि:—धन्वन्तरि नामक अवतार; च—तथा; भगवान्—श्रीभगवान्; स्वयम् एव—स्वत:; कीर्ति:—साक्षात् कीर्ति; नाम्ना—नाम से; नृणाम् पुरु-रुजाम्—रुग्ण जीवात्माओं के; रुज:—रोग; आशु—तुरन्त; हन्ति—अच्छा करता है; यज्ञे—यज्ञ में; च—भी; भागम्—भाग, हिस्सा; अमृत—अमृत; आयु:—उम्र; अव—से; अवरुन्धे—प्राप्त करता है; आयुष्य—जीवन काल का; वेदम्—ज्ञान; अनुशास्ति—निर्देश करता है; अवतीर्य—अवतार लेकर; लोके—ब्रह्माण्ड में ।.
 
अनुवाद
 
 अपने धन्वन्तरि अवतार में भगवान् अपने साक्षात् यश के द्वारा निरन्तर रुग्ण रहने वाली जीवात्माओं के रोगों का तुरन्त उपचार कर देते हैं और उनके कारण ही सभी देवता दीर्घायु प्राप्त करते हैं। इस प्रकार भगवान् सदा के लिए महिमामण्डित हो जाते हैं। उन्होंने यज्ञों में से भी एक अंश निकाल लिया और उन्होंने ही विश्व में ओषधि विज्ञान (आयुर्वेद) का प्रवर्तन किया।
 
तात्पर्य
 जैसाकि श्रीमद्भागवत के प्रारम्भ में कहा जा चुका है, प्रत्येक वस्तु श्रीभगवान् रूपी परम स्रोत से ही उद्भूत है, अत: इस श्लोक से यही ध्वनित होता है कि श्रीभगवान् ने अपने धन्वन्तरि अवतार में आयुर्वेद का भी प्रवर्तन किया और इस प्रकार यह ज्ञान वेदों में वर्णित है। वेद समस्त ज्ञान के स्रोत हैं, अत: जीवों के रोगों को पूर्ण रूप से ठीक करने की सारी जानकारी भी उनमें वर्णित है। देहधारी जीवात्माएँ शरीर की रचना के कारण रुग्ण होती रहती हैं। यह शरीर व्याधि का प्रतीक है। रोग तरह-तरह के हो सकते हैं, किन्तु वे शरीर में उसी तरह रहते हैं जैसे प्रत्येक के साथ जन्म तथा मृत्यु। अत: भगवत्कृपा से न केवल शरीर तथा मन के रोग अच्छे होते हैं, वरन् आत्मा को भी निरन्तर आवागमन से मुक्ति मिल जाती है। भगवान् का एक नाम भवौषधि भी है, जिसका अर्थ है भव रोगों से बचाव का स्रोत।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥