श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक
तत् कर्म दिव्यमिव यन्निशि नि:शयानं
दावाग्निना शुचिवने परिदह्यमाने ।
उन्नेष्यति व्रजमतोऽवसितान्तकालं
नेत्रे पिधाप्य सबलोऽनधिगम्यवीर्य: ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—उस; कर्म—कार्य; दिव्यम्—अलौकिक; इव—सदृश; यत्—जो; निशि—रात्रि में; नि:शयानम्—चिन्तामुक्त सोते हुए; दाव-अग्निना—वन की अग्नि की लपट से; शुचि-वने—शुष्क वन में; परिदह्यमाने—आग लगाये जाने पर; उन्नेष्यति—उबार लेंगे; व्रजम्—व्रज के समस्त वासी; अत:—अत:; अवसित—निश्चय ही; अन्त-कालम्—जीवन के अन्तिम क्षण; नेत्रे—आँखों में; पिधाप्य—मात्र बन्द करके; स-बल:—बलदेव सहित; अनधिगम्य—अगाध; वीर्य:—पराक्रम ।.
 
अनुवाद
 
 कालिय नाग को दण्डित करने के दिन ही रात्रि के समय, जब ब्रजभूमि के समस्त वासी निश्चिन्त होकर सो रहे थे तो सूखी पत्तियों के कारण जंगल में अग्नि धधक उठी और ऐसा लगा मानो उनकी मृत्यु अवश्यम्भावी है। किन्तु आँखें बन्द करके बलराम जी के साथ भगवान् ने उन सबको बचा लिया। ऐसे हैं भगवान् के अलौकिक कार्यकलाप!
 
तात्पर्य
 यद्यपि इस श्लोक में कहा गया है कि भगवान् का यह कार्य अलौकिक है, किन्तु यह समझ लेना चाहिए भगवान् के सारे कार्यकलाप सदैव ही अलौकिक होते हैं और इस प्रकार वे सामान्य जीवों से भिन्न हैं। विशाल अर्जुन वृक्ष को उखाडऩा तथा आँखें बन्द करके वन की धधकती आग को बुझा देना, निश्चय ही मनुष्य द्वारा किसी प्रकार सम्भव नहीं हैं। न केवल ये कार्यकलाप सुनने में आश्चर्यजनक लगते हैं, किन्तु वस्तुत: भगवान् के सारे कार्यकलाप अलौकिक होते हैं जिसकी पुष्टि भगवद्गीता (४.९) में की गई है। जो भी भगवान् के इन दिव्य एवं अलौकिक कार्यों को समझ लेता है, वह श्रीकृष्ण के धाम में प्रवेश करने का अधिकारी हो जाता है और इस वर्तमान भौतिक शरीर को त्यागने के बाद भगवान् के दिव्य कार्यकलापों का ज्ञाता भगवान् के धाम को जाता है।
 
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