श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक
नन्दं च मोक्ष्यति भयाद् वरुणस्य पाशाद्
गोपान् बिलेषु पिहितान् मयसूनुना च ।
अह्न्यापृतं निशि शयानमतिश्रमेण
लोकं विकुण्ठमुपनेष्यति गोकुलं स्म ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
नन्दम्—नन्द (कृष्ण के धर्मपिता) को; च—भी; मोक्ष्यति—बचाता है; भयात्—भय से; वरुणस्य—जल के देव वरुण के; पाशात्—चंगुल से; गोपान्—ग्वालों को; बिलेषु—पर्वत गुफा में; पिहितान्—रखे गये; मय-सूनुना—मय के पुत्र द्वारा; च— भी; अह्नि आपृतम्—दिन के समय व्यस्तता वश; निशि—रात में; शयानम्—लेटे हुए; अतिश्रमेण—कठिन श्रम के कारण; लोकम्—लोक; विकुण्ठम्—वैकुण्ठ; उपनेष्यति—प्रदान किया; गोकुलम्—सर्वोच्च लोक; स्म—निश्चय ही ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने पिता नन्द महाराज को वरुण के भय से बचाया और ग्वालबालों को पर्वत की कन्दरा में से, जहाँ मय के पुत्र ने उन्हें बन्दी कर रखा था, मुक्त किया। यही नहीं, भगवान् श्रीकृष्ण ने वृन्दावन के समस्त वासियों को, जो दिन भर काम में व्यस्त रहकर रात में थक कर निश्चिन्त सोते थे, परव्योम में सर्वोच्च लोक का भागी बना दिया। ये सारे कार्य दिव्य हैं और उनके ईश्वरत्व को सिद्ध करने वाले हैं।
 
तात्पर्य
 एक बार भ्रमवश अर्धरात्रि में ही श्रीकृष्ण के धर्मपिता नन्द महाराज यह सोच कर कि रात समाप्त हो चुकी है, यमुना में स्नान करने गये, तो वरुण देव यह सोचकर उन्हें वरुण लोक लेते गये कि वे भगवान् कृष्ण के दर्शन कर पायेंगे। भगवान् श्रीकृष्ण अपने पिता को छुड़ाने गये। वास्तव में नन्द महाराज बन्दी नहीं थे, क्योंकि वृन्दावन के सारे निवासी अहर्निश श्रीकृष्ण का चिन्तन करते हुए भक्तियोग की समाधि में निमग्न रहते थे। उन्हें किसी भौतिक कष्ट का भय न था। भगवद्गीता में इसकी पुष्टि की गई है कि दिव्य प्रेमवश पूर्णत: आत्म-समर्पण करके, भगवान् की संगति में रहने से, मनुष्य को सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिल जाती है। यहाँ यह स्पष्ट उल्लेख है कि वृन्दावन के वासी दिन भर कठिन परिश्रम करते थे और थक कर रात में चैन की नींद सोते थे। फलत: उन्हें पूजा करने या आध्यात्मिक कार्यों के लिए प्राय: बहुत कम समय मिल पाता था। किन्तु वास्तव में वे सर्वोत्कृष्ट आध्यात्मिक कार्यों में ही मग्न रहते थे। उनका हर कार्य आध्यात्मिक होता था, क्योंकि वह श्रीकृष्ण के साथ उनके सम्बन्धों से ही जुड़ा होता था। उनके कार्यों के केन्द्रबिन्दु श्रीकृष्ण थे, फलत: उनके सारे तथाकथित भौतिक कार्य आध्यात्मिक शक्ति से संतृप्त होते थे। भक्तियोग पद्धति का यही लाभ है। मनुष्य को चाहिए कि वह हर कार्य भगवान् के निमित्त करे और इस प्रकार उसके सम्पूर्ण कार्य कृष्ण के विचार से संतृप्त होंगे जो आध्यात्मिक साक्षात्कार में समाधि का उच्चतम रूप है।
 
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