श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक
कालेन मीलितधियामवमृश्य नृणां
स्तोकायुषां स्वनिगमो बत दूरपार: ।
आविर्हितस्त्वनुयुगं स हि सत्यवत्यां
वेदद्रुमं विटपशो विभजिष्यति स्म ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
कालेन—समय के साथ; मीलित-धियाम्—कम बुद्धिमान मनुष्यों का; अवमृश्य—कठिनाई को ध्यान में रखते हुए; नृणाम्— मनुष्यों की; स्तोक-आयुषाम्—अल्पजीवी लोगों का; स्व-निगम:—अपने द्वारा संकलित वैदिक साहित्य; बत—ठीक-ठीक; दूर-पार:—अत्यन्त कठिन; आविर्हित:—के रूप में प्रकट होकर; तु—लेकिन; अनुयुगम्—युग के अनुसार; स:—वह (भगवान्); हि—निश्चय ही; सत्यवत्याम्—सत्यवती के गर्भ में; वेद-द्रुमम्—वेदरूपी कल्पवृक्ष; विट-पश:—शाखाओं के विभाजन द्वारा; विभजिष्यति—बाँट देगा; स्म—मानो ।.
 
अनुवाद
 
 सत्यवती के पुत्र (व्यासदेव) रूप में अवतार ग्रहण करके स्वयं भगवान् वैदिक साहित्य के संग्रह को अल्पजीवी अल्पज्ञों के लिए कठिन समझकर वैदिक ज्ञानरूपी वृक्ष को युग विशेष की परिस्थितियों के अनुसार शाखाओं में विभाजित कर देंगे।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर ब्रह्मा ने कलियुग के अल्पजीवी मनुष्यों के लिए श्रीमद्भागवत के भावी संकलन का उल्लेख किया है। जैसाकि प्रथम स्कन्ध में बताया जा चुका है कलियुग के अल्पज्ञ मनुष्य अल्पजीवी होंगे और साथ ही ईश्वरविहीन मानव समाज होने के कारण जीवन की अनेक समस्याओं से उद्विग्न होंगे। भौतिक प्रकृति के नियमों के अनुसार, शरीर की भौतिक सुविधाओं में उन्नति का होना तमोगुण का सूचक है। ज्ञान की वास्तविक उन्नति का अर्थ है आत्म-साक्षात्कार। किन्तु कलियुग के अल्पज्ञानी पुरुष भ्रमवश एक सौ वर्ष की लघुजीवन-अवधि को ही (जो अब घट कर ४० या ६० वर्ष हो चुकी है) सब कुछ मान बैठते हैं। वे अल्पज्ञानी हैं, क्योंकि उन्हें जीवन की नित्यता का ज्ञान नहीं होता; वे चालीस वर्षों तक रहने वाले क्षणिक भौतिक शरीर को जीवन का मूल तत्त्व मान लेते हैं। ऐसे मनुष्य गधों तथा बैलों के तुल्य हैं। किन्तु भगवान् समस्त जीवों को, दयालु पिता की भाँति, भगवद्गीता जैसे ग्रन्थों के रूप में और स्नातकों के लिए श्रीमद्भागवत के रूप में विपुल वैदिक ज्ञान प्रदान करते रहते हैं। इसी प्रकार विभिन्न प्राकृतिक गुणों से युक्त विभिन्न प्रकार के मनुष्यों के लिए व्यासदेव ने पुराणों तथा महाभारत की रचना की। किन्तु इनमें से कोई भी ग्रन्थ वैदिक सिद्धान्तों से पृथक् नहीं है।
 
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