श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक
विष्णोर्नु वीर्यगणनां कतमोऽर्हतीह
य: पार्थिवान्यपि कविर्विममे रजांसि ।
चस्कम्भ य: स्वरहसास्खलता त्रिपृष्ठं
यस्मात् त्रिसाम्यसदनादुरुकम्पयानम् ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
विष्णो:—भगवान् विष्णु का; नु—लेकिन; वीर्य—पराक्रम; गणनाम्—गिनती में; कतम:—ऐसा कौन है; अर्हति—इसे करने में सक्षम है; इह—इस जगत में; य:—जो; पार्थिवानि—परमाणु; अपि—भी; कवि:—महान् विज्ञानी; विममे—गिन पाया होगा; रजांसि—कणों को; चस्कम्भ—पकड़ सके; य:—जो; स्व-रहसा—अपने पैर से; अस्खलता—बिना रुके; त्रि-पृष्ठम्—उच्चतम अन्तरिक्ष; यस्मात्—जिससे; त्रि-साम्य—तीनों गुणों का सन्तुलन; सदनात्—उस स्थान तक; उरु-कम्पयानम्—अत्यधिक विचलित ।.
 
अनुवाद
 
 भला ऐसा कौन है, जो विष्णु के पराक्रम का पूरी तरह से वर्णन कर सके? यहाँ तक कि वह विज्ञानी भी, जिसने ब्रह्माण्ड के समस्त कणों के परमाणुओं की गणना की होगी, वह भी ऐसा नहीं कर सकता। वे ही एकमात्र ऐसे हैं जिन्होंने त्रिविक्रम के रूप में जब अपने पाँव को बिना प्रयास के सर्वोच्च लोक, सत्यलोक, से भी आगे प्रकृति के तीनों गुणों की साम्यावस्था तक हिलाया था, तो सारा ब्रह्माण्ड हिलने लगा था।
 
तात्पर्य
 भौतिक विज्ञानियों की सर्वोच्च वैज्ञानिक प्रगति परमाणु शक्ति है, किन्तु किसी भी भौतिक विज्ञानी को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के कणों में निहित परमाणुओं का कोई अनुमान नहीं है। और यदि कोई इन सूक्ष्म कणों को गिन भी ले अथवा आकाश को बिस्तर की भाँति मोड़ भी सके, तो भी वह परमेश्वर के वीर्य तथा शक्ति का अनुमान लगाने में असमर्थ होगा। वे त्रिविक्रम कहलाते हैं, क्योंकि अपने वामन अवतार में उन्होंने अपने पदचाप को सर्वोच्च सत्यलोक से भी आगे फैला दिया था और वे तीनों गुणों की साम्यावस्था तक पहुँच गये थे जिसे भौतिक जगत का छादन (कोश) कहा जाता है। भौतिक आकाश के ऊपर भौतिक छादन के सात स्तर (कोश) हैं और भगवान् ने इन सातों को भेद दिया था। उन्होंने अपने अँगूठे से छेद बना दिया जिससे होकर कारणार्णव का जल भौतिक आकाश में छन कर पहुँचता है और यह धारा पवित्र गंगा नदी कहलाती है, जो तीनों लोकों को पवित्र बनाती है। दूसरे शब्दों में, विष्णु के समान दिव्य शक्ति वाला अन्य कोई नहीं। वे सर्वशक्तिमान हैं और न तो कोई उनके समान है, न उनसे बढक़र।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥