श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक
नान्तं विदाम्यहममी मुनयोऽग्रजास्ते
मायाबलस्य पुरुषस्य कुतोऽवरा ये ।
गायन् गुणान् दशशतानन आदिदेव:
शेषोऽधुनापि समवस्यति नास्य पारम् ॥ ४१ ॥
 
शब्दार्थ
न—कभी नहीं; अन्तम्—अन्त, पार; विदामि—जानता हूँ; अहम्—मैं; अमी—तब ये सब; मुनय:—मुनिगण; अग्र-जा:— तुमसे पूर्व उत्पन्न; ते—तुम; माया-बलस्य—सर्वशक्तिमान का; पुरुषस्य—पुरुष (भगवान्) का; कुत:—अन्यों की क्या बात; अवरा:—हमारे बाद उत्पन्न; ये—जो; गायन्—गीत के द्वारा; गुणान्—गुण; दश-शत-आनन:—एक सहस्र मुखों वाला; आदि-देव:—भगवान् का प्रथम अवतार; शेष:—शेष नामक; अधुना—आज तक; अपि—भी; समवस्यति—पा सकता है; न—नहीं; अस्य—उसका; पारम्—पार, अन्त ।.
 
अनुवाद
 
 न तो मैं और न तुमसे पहले उत्पन्न हुए मुनिगण ही सर्वशक्तिमान भगवान् को भलीभाँति जानते हैं। अत: जो हमारे बाद उत्पन्न हुए हैं, वे उनके विषय में क्या जानेंगे? यहाँ तक कि भगवान् के आदि-अवतार शेष भी, जो अपने एक सहस्र मुखों से भगवान् के गुणों का वर्णन करते रहते हैं, ऐसे ज्ञान का अन्त नहीं पा सके हैं।
 
तात्पर्य
 सर्वशक्तिमान भगवान् की तीन मूल शक्तियाँ हैं—अन्तरंगा, बहिरंगा तथा तटस्था और इन तीनों शक्तियों के अनन्त विस्तार हैं। अत: शक्तियों के विस्तार की गणना कर पाना किसी के लिए सम्भव नहीं है, यहाँ तक कि भगवान् स्वयं शेष अवतार में इन शक्तियों का अनुमान नहीं लगा पाते, यद्यपि वे अपने सहस्र मुखों से इनका वर्णन करते रहते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥