श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 43-45
 
 
श्लोक
वेदाहमङ्ग परमस्य हि योगमायां
यूयं भवश्च भगवानथ दैत्यवर्य: ।
पत्नी मनो: स च मनुश्च तदात्मजाश्च
प्राचीनबर्हिर्ऋभुरङ्ग उत ध्रुवश्च ॥ ४३ ॥
इक्ष्वाकुरैलमुचुकुन्दविदेहगाधि-
रघ्वम्बरीषसगरा गयनाहुषाद्या: ।
मान्धात्रलर्कशतधन्वनुरन्तिदेवा
देवव्रतो बलिरमूर्त्तरयो दिलीप: ॥ ४४ ॥
सौभर्युतङ्कशिबिदेवलपिप्पलाद-
सारस्वतोद्धवपराशरभूरिषेणा: ।
येऽन्ये विभीषणहनूमदुपेन्द्रदत्त-
पार्थार्ष्टिषेणविदुरश्रुतदेववर्या: ॥ ४५ ॥
 
शब्दार्थ
वेद—इसे जानो; अहम्—मैं; अङ्ग—हे नारद; परमस्य—परमेश्वर की; हि—निश्चय ही; योग-मायाम्—शक्ति; यूयम्—तुम; भव:—शिव; च—तथा; भगवान्—परम देव; अथ—भी; दैत्य-वर्य:—नास्तिक के कुल में उत्पन्न भगवद्भक्त, प्रह्लाद महाराज; पत्नी—शतरूपा; मनो:—मनु की; स:—वह; च—भी; मनु:—स्वायंभुव; च—तथा; तत्-आत्म-जा: च—तथा उनकी सन्तानें यथा प्रियव्रत, उत्तानपाद, देवहूति इत्यादि.; प्राचीनबर्हि:—प्राचीनबर्हि; ऋभु:—ऋभु; अङ्ग:—अंग; उत—भी; ध्रुव:—ध्रुव; च—तथा; इक्ष्वाकु:—इक्ष्वाकु; ऐल—ऐल; मुचुकुन्द—मुचुकुन्द; विदेह—महाराज जनक; गाधि—गाधि; रघु—रघु; अम्बरीष—अम्बरीष; सगरा:—सगर; गय—गय; नाहुष—नाहुष; आद्या:—इत्यादि; मान्धातृ—मान्धाता; अलर्क—अलर्क; शतधनु—शतधनु; अनु—अनु; रन्तिदेवा:—रन्तिदेव; देवव्रत:—भीष्म; बलि:—बलि; अमूर्त्तरय:—अमूर्तरय; दिलीप:— दिलीप; सौभरि—सौभरि; उतङ्क—उतंक; शिबि—शिबि; देवल—देवल; पिप्पलाद—पिप्पलाद; सारस्वत—सारस्वत; उद्धव— उद्धव; पराशर—पराशर; भूरिषेणा:—भूरिषेण; ये—जो; अन्ये—अन्य; विभीषण—विभीषण; हनूमत्—हनुमान; उपेन्द्र-दत्त— शुकदेव गोस्वामी; पार्थ—अर्जुन; आर्ष्टिषेण—आर्ष्टिषेण; विदुर—विदुर; श्रुतदेव—श्रुतदेव; वर्या:—अग्रणी, श्रेष्ठ ।.
 
अनुवाद
 
 हे नारद, यद्यपि भगवान् की शक्तियाँ अज्ञेय तथा अपरिमेय हैं फिर भी शरणागत जीव होने के नाते, हम समझ सकते हैं कि वे योगमाया की शक्तियों के द्वारा किस प्रकार कार्य करते हैं। इसी प्रकार भगवान् की शक्तियाँ सर्वशक्तिमान शिव, नास्तिक कुल के महान् राजा प्रह्लाद महाराज, स्वायंभुव मनु, उनकी पत्नी शतरूपा, उनके पुत्र तथा पुत्रियाँ यथा प्रियव्रत, उत्तानपाद, आकूति, देवहूति तथा प्रसूति; प्राचीनबर्हि, ऋभु, वेन के पिता अंग, महाराज ध्रुव, इक्ष्वाकु, ऐल, मुचुकुन्द, महाराज जनक, गाधि, रघु, अम्बरीष, सगर, गय, नाहुष, मान्धाता, अलर्क, शतधनु, अनु, रन्तिदेव, भीष्म, बलि, अमूर्त्तरय, दिलीप, सौभरि, उतङ्क, शिबि, देवल, पिप्पलाद, सारस्वत, उद्धव, पराशर, भूरिषेण, विभीषण, हनुमान, शुकदेव गोस्वामी, अर्जुन, आर्ष्टिषेण, विदुर, श्रुतदेव इत्यादि को भी ज्ञात हैं।
 
तात्पर्य
 जैसाकि ऊपर कहा गया है, भूतकाल या वर्तमान काल में भगवान् के जितने भक्त हुए हैं तथा भविष्य में जितने भी भक्त होंगे, वे सब भगवान् की विभिन्न शक्तियों के साथ-साथ उनके नाम, गुण, लीला, संगी, व्यक्तित्व इत्यादि की शक्तियों से अवगत रहते हैं। वे उन्हें किस प्रकार जानते हैं? निश्चय ही, ऐसा न तो कल्पना से और न ज्ञानेन्द्रियों की सीमित सहायता से होता है। सीमित ज्ञानेन्द्रियों द्वारा (चाहे शारीरिक इन्द्रियाँ हों या भौतिक सूक्ष्मदर्शी तथा दूरदर्शी जैसे उपकरण) हम अपनी आँखों के सामने प्रकट होने वाली भगवान् की भौतिक शक्तियों को भी ठीक से नहीं जान पाते। उदाहरणार्थ, विज्ञानियों की गणना से परे कोटि-कोटि ग्रह (लोक) विद्यमान हैं किन्तु ये भगवान् की भौतिक शक्ति के ही स्वरूप हैं। विज्ञानी ऐसे भौतिक प्रयासों द्वारा भला भगवान् की आध्यात्मिक शक्ति के विषय में जानने की क्या आशा कर सकता है? “यदि” तथा “हो सकता है” जैसी दर्जनों कल्पनाओं से ज्ञान की प्रगति नहीं हो सकती—उल्टे, ऐसी कल्पना से ईश्वर का अस्तित्व
न होना बताया जाएगा और निराशा ही हाथ लगेगी और बात आई गई कर दी जाएगी। अत: बुद्धिमान मनुष्य अपने लघु मस्तिष्क की सीमा से परे विषयों के सम्बन्ध में चिन्तन नहीं करता, अपितु वह परमेश्वर को आत्म-समर्पण करना सीखता है, क्योंकि वही उसे वास्तविक ज्ञान तक पहुँचा सकता है। उपनिषदों में स्पष्ट उल्लेख है कि मात्र कठिन श्रम करने तथा मस्तिष्क पर जोर लगाने से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को कभी नहीं जाना जा सकता, न ही उसे कल्पना तथा शब्दजाल द्वारा जाना जा सकता है। ईश्वर को तो वही जान पाता है, जो उनकी शरणागत है। यहाँ पर जीवों में सर्वोच्च, ब्रह्माजी, ने इस सत्य को अंगीकार किया है। अत: प्रयोगात्मक ज्ञान के मार्ग का अनुसरण करने में शक्ति का अपव्यय करना छोड़ देना चाहिए। मनुष्य को चाहिए कि भगवान् के प्रति समर्पित होकर तथा यहाँ पर वर्णित अधिकारी पुरुषों की प्रामाणिकता को स्वीकार करके ज्ञान-लाभ करे। भगवान् अनन्त होने के कारण योगमाया की कृपा से उसे स्वयं को जानने में शरणागत की क्रमश: सहायता करते हैं।
 
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥