श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक
स श्रेयसामपि विभुर्भगवान् यतोऽस्य
भावस्वभावविहितस्य सत: प्रसिद्धि: ।
देहे स्वधातुविगमेऽनुविशीर्यमाणे
व्योमेव तत्र पुरुषो न विशीर्यतेऽज: ॥ ४९ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; श्रेयसाम्—समस्त कल्याण; अपि—भी; विभु:—स्वामी; भगवान्—भगवान्; यत:—क्योंकि; अस्य—जीवात्मा का; भाव—गुण; स्व-भाव—अपना स्वभाव; विहितस्य—कार्य; सत:—समस्त उत्तम कार्य; प्रसिद्धि:—अन्तिम सफलता; देहे—शरीर के; स्व-धातु—निर्माणक तत्त्व; विगमे—नष्ट होने पर; अनु—बाद में; विशीर्यमाणे—त्याग दिये जाने पर; व्योम— आकाश; इव—समान; तत्र—तत्पश्चात्; पुरुष:—जीवात्मा; न—कभी नहीं; विशीर्यते—नष्ट होता है; अज:—अजन्मा ।.
 
अनुवाद
 
 जो कुछ भी कल्याणकर है उसके परम स्वामी भगवान् हैं, क्योंकि जीवात्मा जो भी कर्म करता है, चाहे वे भौतिक अथवा आध्यात्मिक अवस्था में किये जाँय, सबका फल देनेवाले भगवान् हैं। इस प्रकार वह परम उपकारी है। प्रत्येक जीवात्मा अजन्मा है, अत: इस भौतिक तत्त्वमय शरीर के विनष्ट होने के बाद भी, यह शरीर उसी प्रकार बना रहता है, जिस प्रकार शरीर के भीतर वायु रह जाती है।
 
तात्पर्य
 जीव अजन्मा तथा नित्य है और जैसा भगवद्गीता (२.३०) में पुष्टि की गई है भौतिक तत्त्वमय देह के विनष्ट होने पर भी जीव नष्ट नहीं होता। जब तक जीव इस संसार में रहता है तब तक उसके द्वारा किये गये कर्मों का फल उसे अगले जीवन में अथवा इसी जीवन में मिलता है। इसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन के कार्य भी भगवान् द्वारा पाँच प्रकार की मुक्ति के रूप में पुरस्कृत होते हैं। यहाँ तक कि निर्विशेषवादी भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की कृपा के बिना परमेश्वर का तादात्म्य प्राप्त नहीं कर सकते। भगवद्गीता (४.११) में पुष्टि की गई है कि वे मनुष्य को इसी जीवन में उसके वांछित फल प्रदान करते हैं। जीवों को अपनी इच्छा करने की छूट रहती है और भगवान् उन्हें तदनुसार फल देते हैं।

अत: यह प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि अभिलिषित उद्देश्य की पूर्ति के लिए केवल भगवान् की दृढ़ता से भक्ति करे। निर्विशेषवादी भी चाहे तो चिन्तन या मनन करने के बजाय भगवान् की नियमित भक्तिमय सेवा करके आसानी से वांछित फल प्राप्त कर सकता है।

किन्तु भक्तजन स्वभावत: भगवान् के पार्षद रूप में रहना पसन्द करते हैं। वे निर्विशेषवादियों की भाँति तादात्म्य नहीं चाहते। अत: भक्तजन अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति के अनुसार भगवान् के दास, मित्र, पिता, माता तथा युगल-प्रेमी बनकर मनवांछित उद्देश्य की प्राप्ति करते हैं। भगवद्भक्ति की नौ दिव्य विधियाँ हैं—यथा श्रवण, कीर्तन इत्यादि और ऐसी सरल तथा स्वाभाविक भक्ति का अनुसरण करके भक्त उच्चतम सिद्धियाँ प्राप्त करते हैं, जो ब्रह्म के साथ तदाकार होने की अपेक्षा कहीं श्रेष्ठतर हैं। अत: भक्तों को ब्रह्म के विषय में मनन करने अथवा शून्य में कृत्रिम रूप से चिन्तन करने की कभी सलाह नहीं दी जाती।

फिर भी भूल कर भी यह नहीं सोचना चाहिए कि इस वर्तमान देह के विनाश के बाद, ऐसी दूसरी देह नहीं होती, जिससे भगवान् का साक्षात्कार किया जा सके। जीव तो अजन्मा है। ऐसा नहीं है कि भौतिक देह की उत्पत्ति के साथ जीव प्रकट होता हो। दूसरी ओर, इस शरीर का विकास जीव की इच्छाओं के फलस्वरूप ही होता है। इस प्रकार जीवात्मा की इच्छा से भौतिक शरीर का प्राकट्य होता है। अत: आत्मतत्त्व से भौतिक शरीर, जीवनी शक्तीयों से उत्पन्न होकर अलिप्त में आता है चूँकि जीव शाश्वत है, अत: वह शरीर के भीतर वायु की तरह विद्यमान रहता है। शरीर के भीतर तथा बाहर वायु ही वायु है, अत: जब बाहरी आवरण अर्थात् भौतिक शरीर नष्ट हो जाता है, तो जीवित स्फुल्लिंग शरीर में वायु की भाँति रहता चला आता है। परम उपकारी भगवान् के निर्देशानुसार, जीव को उचित आध्यात्मिक शरीर प्राप्त होता है, जो भगवान् से उनकी संगति के अनुसार सारूप्य (समान शारीरिक अंग), सालोक्य (भगवान् के साथ उसी लोक में रहने की समान सुविधा), सार्ष्टि (भगवान् की तरह समान ऐश्वर्य की प्राप्ति) तथा सामीप्य (भगवान् के साथ समान संगति) रूप में होता है।

भगवान् इतने दयालु हैं कि यदि कोई भक्त भौतिक संगति से अकलुषित तथा अमिश्रित भक्ति मय सेवा का चरण पूरा नहीं कर पाता तो उसे किसी भक्त या धनी के परिवार में उत्पन्न करके, बिना किसी जीवन-संघर्ष के दूसरे जन्म में पुन: अवसर प्रदान किया जाता है, जिससे वह अपने जीवन के शुद्धीकरण की शेषप्रक्रिया को पूरा कर ले और इस देह को त्याग करने पर तुरन्त ही भगवद्धाम को जा सके। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में हुई है।

इस प्रसंग में श्रील जीव गोस्वामी प्रभुपाद कृत भागवत-संदर्भ में विस्तृत जानकारी उपलब्ध है। एक बार आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करके भक्त निरन्तर उसी में बना रहता है जैसाकि पिछले श्लोक में कहा जा चुका है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥