श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 5

 
श्लोक
तप्तं तपो विविधलोकसिसृक्षया मे
आदौ सनात् स्वतपस: स चतु:सनोऽभूत् ।
प्राक्कल्पसम्प्लवविनष्टमिहात्मतत्त्वं
सम्यग् जगाद मुनयो यदचक्षतात्मन् ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
तप्तम्—तपस्या करके; तप:—तपस्या; विविध-लोक—विभिन्न लोक; सिसृक्षया—सृष्टि करने की इच्छा से; मे—मेरा; आदौ—सर्वप्रथम; सनात्—श्रीभगवान् से; स्व-तपस:—अपनी तपस्या के बल से; स:—वह (भगवान्); चतु:-सन:—चारों कुमार जिनके नाम हैं, सनत्कुमार, सनक, सनन्दन तथा सनातन; अभूत्—प्रकट हुए; प्राक्—पूर्व; कल्प—सृष्टि; सम्प्लव— बाढ़ में; विनष्टम्—नष्ट; इह—इस संसार में; आत्म—आत्मा; तत्त्वम्—सत्य; सम्यक्—पूर्णत:; जगाद—प्रकट हुआ; मुनय:— मुनिगण; यत्—जिन्होंने; अचक्षत—स्पष्ट देखा; आत्मन्—आत्मा ।.
 
अनुवाद
 
 विभिन्न लोकों की उत्पत्ति करने के लिए मुझे तपस्या करनी पड़ी और तब भगवान् ने मुझसे प्रसन्न होकर चारों कुमारों (सनक, सनत्कुमार, सनन्दन तथा सनातन) के रूप में अवतार लिया। पिछली सृष्टि में आध्यात्मिक सत्य (आत्मज्ञान) का विनाश हो चुका था, किन्तु इन चारों कुमारों ने इतने स्पष्ट ढंग से उसकी व्याख्या की कि मुनियों को तुरन्त सत्य का साक्षात्कार हो गया।
 
तात्पर्य
 विष्णुसहस्रनाम स्तोत्रों में भगवान् का नाम सनात तथा सनातनतम है। यद्यपि भगवान् तथा जीवात्मा गुणात्मक दृष्टि से सनातन अर्थात् शाश्वत हैं, किन्तु भगवान् सनातनतम अर्थात् सनातनों में सर्वश्रेष्ठ हैं। जीवात्माएँ निस्सन्देह सनातन हैं किन्तु सनातनतम नहीं, क्योंकि ये अ-शाश्वत जगत में पतित हो सकती हैं। अत: जीवात्माएँ सनातनतम भगवान् से मात्रा की दृष्टि से भिन्न हैं।
सन् शब्द दान के अर्थ में भी आया है, अत: जब भक्त भगवान् को अपना सर्वस्व दान-रूप में सौंप देता है, तो बदले में भगवान् अपने आपको भक्त को सौंप देते हैं। भगवद्गीता (४.११) में भी इसकी पुष्टि हुई है—ये यथा मां प्रपद्यन्ते। ब्रह्माजी ने पूर्व कल्प की भाँति फिर से सृष्टि की उत्पत्ति करनी चाही और चूँकि पिछले प्रलय में, ब्रह्माण्ड से ब्रह्म-ज्ञान विलुप्त हो चुका था, इसीलिए वे उसे पुन: जीवित करना चाह रहे थे। चूँकि दिव्य ज्ञान मूलभूत आवश्यकता है, अत: सृष्टि के प्रत्येक कल्प में नित्य बद्धजीवों को मुक्ति का अवसर प्रदान किया जाता है। ब्रह्माजी की इस इच्छा की पूर्ति भगवान् ने चारों कुमारों अर्थात् सनक, सनत्कुमार, सनन्दन तथा सनातन को उनके पुत्र रूप में उत्पन्न करके की। ये चारों कुमार परमेश्वर के ज्ञानावतार थे, अत: उन्होंने दिव्य ज्ञान की ऐसी स्पष्ट व्याख्या की कि सभी मुनि बिना किसी कठिनाई के उस ज्ञान को प्राप्त कर सके। इन चारों कुमारों के पदचिह्नों पर चल कर कोई भी अपने अंत:करण में भगवान् का दर्शन कर सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥