श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक
सोऽयं तेऽभिहितस्तात भगवान् विश्वभावन: ।
समासेन हरेर्नान्यदन्यस्मात् सदसच्च यत् ॥ ५० ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; अयम्—वही; ते—तुमको; अभिहित:—मेरे द्वारा कहा गया; तात—हे पुत्र; भगवान्—भगवान्; विश्व-भावन:— प्रकट ब्राह्मणों के स्रष्टा; समासेन—संक्षेप में; हरे:—हरि अर्थात् भगवान् के बिना; न—कभी नहीं; अन्यत्—अन्य कोई वस्तु; अन्यस्मात्—कारणस्वरूप; सत्—प्रकट, गोचर; असत्—तात्त्विक; च—तथा; यत्—चाहे जो भी हो ।.
 
अनुवाद
 
 हे पुत्र, मैंने तुम्हें संक्षेप में प्रकट जगतों के स्रष्टा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के विषय में बतलाया है। गोचर तथा तात्विक अस्तित्व का कारण हरि के अतिरिक्त और कोई नहीं है।
 
तात्पर्य
 चूँकि सामान्य रूप से हमें नाशवान भौतिक जगत तथा भौतिक जगत पर अधिकार प्राप्त करने में प्रयत्नशील बद्धजीवों का ही अनुभव है, अत: ब्रह्माजी ने नारददेव को बताया कि यह अनित्य जगत भगवान् की बहिरंगा शक्ति की करामात है और यहाँ पर संघर्ष कर रहे बद्धजीव भगवान् की तटस्था शक्ति हैं। इन गोचर कार्यकलापों का एकमात्र कारण परमेश्वर, अर्थात् हरि हैं, जो समस्त कारणों के कारणस्वरूप हैं। किन्तु इससे यह अर्थ नहीं लगाना चाहिए कि भगवान् निर्गुण रूप में सर्वत्र व्याप्त हैं। वे इन समस्त बहिरंगा तथा तटस्था शक्तियों की अन्त:क्रिया से पृथक् रहने वाले हैं। भगवद्गीता (९.४) में पुष्टि की गई है कि भगवान् अपनी शक्तियों के द्वारा ही सर्वत्र व्याप्त हैं। जो कुछ भी प्रकट रूप में है, वह उनकी शक्ति पर निर्भर है, किन्तु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् होने के कारण वे प्रत्येक वस्तु से विलग रहते हैं। शक्ति तथा शक्तिमान एक होने पर भी एक दूसरे से पृथक् हैं।

भगवान् को इस दुखमय संसार की सृष्टि के लिए भला-बुरा नहीं कहा जा सकता जिस प्रकार कि राजा को राज्य में कारागार बनाने के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जो राजसत्ता की आज्ञा उल्लंघन करते हैं उनके लिए कारागार रूपी संख्या अनिवार्य है। इसी प्रकार भगवान् ने इस दुखमय भौतिक संसार की क्षणिक सृष्टि उन लोगों के लिए की है, जो उनको भूल गये हैं और इस झूठे संसार पर प्रभुत्व जमाने का प्रयास कर रहे हैं। फिर भी वे पतित आत्माओं को अपने धाम में वापस ले जाने के लिए इच्छुक रहते हैं और इसके लिए प्रामाणिक धर्मशास्त्रों, प्रतिनिधियों तथा अवतारों के रूप में बद्धजीवों को अनेक अवसर प्रदान करते रहते हैं। चूँकि उनका इस भौतिक जगत से कोई प्रत्यक्ष जुड़ाव नहीं है, अत: इसकी सृष्टि के लिए उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥