श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक
यथा हरौ भगवति नृणां भक्तिर्भविष्यति ।
सर्वात्मन्यखिलाधारे इति सङ्कल्प्य वर्णय ॥ ५२ ॥
 
शब्दार्थ
यथा—जिस प्रकार; हरौ—हरि में; भगवति—भगवान् में; नृणाम्—मनुष्यों के लिए; भक्ति:—भक्ति; भविष्यति—प्रकाशित हो; सर्व-आत्मनि—परम पूर्ण; अखिल-आधारे—सबके आश्रय को; इति—इस प्रकार; सङ्कल्प्य—दृढ़ निश्चय द्वारा; वर्णय— वर्णन करो ।.
 
अनुवाद
 
 तुम इस भगवद्ज्ञान का संकल्पपूर्वक इस विधि से वर्णन करो जिससे कि सभी मनुष्य, प्रत्येक जीव के परमात्मा तथा समस्त शक्तियों के आधारस्वरूप भगवान् हरि के प्रति दिव्य भक्ति उत्पन्न कर सकें।
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत भक्ति तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ मनुष्य के सम्बन्ध की वैज्ञानिक प्रस्तुति का दर्शन है। कलियुग के पूर्व भगवान् तथा उनकी शक्तियों को जानने के लिए इस प्रकार के ज्ञान-ग्रन्थ की आवश्यकता नहीं थी, लेकिन कलियुग के आरम्भ होते ही, मानव समाज धीरे-धीरे पापाचार—यथा पर स्त्री से अवैध सम्बन्ध, मादक द्रव्य सेवन, द्यूत क्रीड़ा तथा अनावश्यक पशु- हिंसा—से प्रभावित होने लगा। इन आधारभूत पापकर्मों के फलस्वरूप मनुष्य ईश्वर के साथ अपने शाश्वत सम्बन्ध भूलने लगा। इस तरह मनुष्य जीवन के परम उद्देश्य के प्रति एक प्रकार से अंधा हो गया। जीवन का परम उद्देश्य, गैरजिम्मेदार पशुवत् जीवन अर्थात् आहार, निद्रा, भय तथा मैथुन—इन चार पाशविक कृत्यों में कृत्रिम ढंग से लगे रहना नहीं है। इस प्रकार अविद्या के अंधकार में ग्रस्त अंधे मानव समाज के लिए श्रीमद्भागवत वस्तुओं को उचित परिपेक्ष्य में देखने हेतु दीपक का कार्य करता है। अत: तत्त्व-ज्ञान के वर्णन की आवश्यकता आरम्भ से या परिवर्तनशील सृष्टि के आदिकाल से ही हुई।

जैसाकि हम पहले कह चुके हैं, श्रीमद्भागवत का प्रस्तुतीकरण इतना वैज्ञानिक है कि कोई भी निष्ठावान छात्र इसे ध्यानपूर्वक पढ़ करके या प्रामाणिक वक्ता से नियमित रूप से सुनकर भगवद्ज्ञान को समझ सकता है। इस युग में मानव समाज के सभी लोग जीवन-सुख के पीछे इतने दीवाने हैं कि अंधकार में रहने के कारण उन्हें इतनी भी दृष्टि प्राप्त नहीं है कि वे जानें कि श्रीभगवान् ही समस्त सुख के आगार हैं, क्योंकि वे प्रत्येक वस्तु के परम स्रोत हैं (जन्माद्यस्य यत:)। भगवान् की भक्ति के द्वारा ही अबाध सुख की पूर्ण उपलब्धि सम्भव है और उन्हीं की संगति से हम इस दुखमय संसार से छुटकारा पा सकते हैं। जो लोग इस भौतिक जगत का सुखोपभोग करना चाहते हैं, वे भी श्रीमद्भागवत के महान् ज्ञान की शरण ले सकते हैं और अन्त में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। अत: नारद को उनके गुरु उपदेश देते हैं, या यह कहें कि आदेश देते हैं कि वे इस ज्ञान को संकल्प के साथ व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करें। नारदजी को जीविकोपार्जन हेतु भागवत के सिद्धान्तों का उपदेश देने के लिए कभी नहीं कहा गया, वरन् उनके गुरु ने आदेश दिया कि इसे गम्भीरतापूर्वक प्रचारक की भावना से ग्रहण करें।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥