श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनिष्ट मूर्त्यां
नारायणो नर इति स्वतप:प्रभाव: ।
दृष्ट्वात्मनो भगवतो नियमावलोपं
देव्यस्त्वनङ्गपृतना घटितुं न शेकु: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
धर्मस्य—धर्म की; दक्ष—दक्ष प्रजापति; दुहितरि—पुत्री से; अजनिष्ट—जन्म लिया; मूर्त्याम्—मूर्ति नाम की; नारायण:— नारायण; नर:—नर; इति—इस प्रकार; स्व-तप:—अपनी तपस्या की; प्रभाव:—शक्ति; दृष्ट्वा—देखकर; आत्मन:—अपना; भगवत:—श्रीभगवान् का; नियम-अवलोपम्—व्रत को भंग करके; देव्य:—नैसर्गिक सुन्दरियाँ; तु—लेकिन; अनङ्ग-पृतना:— कामदेव के सखा; घटितुम्—होने के लिए; न—कभी नहीं; शेकु:—सम्भव हो सका ।.
 
अनुवाद
 
 उन्होंने अपनी तपस्या की विधि प्रदर्शित करने के लिए धर्म की पत्नी तथा दक्ष की पुत्री मूर्ति के गर्भ से नर तथा नारायण युगल-रूपों में जन्म लिया। कामदेव की सखियाँ, स्वर्ग की सुन्दरियाँ, उनका व्रत भंग करने आईं, किन्तु वे असफल रहीं, क्योंकि उन्हें भगवान् के शरीर से अपने समान अनेक सुन्दरियाँ उत्पन्न होती दिखाई पड़ीं।
 
तात्पर्य
 भगवान् सभी वस्तुओं के स्रोत तो हैं ही, वे समस्त प्रकार की तपस्याओं के भी उद्गम हैं। आत्म-साक्षात्कार में सफलता प्राप्त करने के लिए मुनि तपस्या का महान् व्रत लेते हैं। मानव जीवन ब्रह्मचर्य के व्रत के साथ-साथ ऐसी तपस्या के लिए ही मिला है। तपस्या में स्त्रियों की संगति के लिए कोई स्थान नहीं है। और चूँकि मनुष्य जीवन तपस्या के निमित्त है, इसीलिए सनातन धर्म अथवा वर्णाश्रम धर्म पद्धति में जीवन के तीनों स्तरों पर स्त्री से दूर रहने की कठोर सलाह दी गई है। सांस्कृतिक विकास क्रम के अनुसार, जीवन के चार विभाग किये जा सकते हैं—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास। जीवन की प्रथम अवस्था में, जो प्रथम पच्चीस वर्षों तक रहती है, मनुष्य को प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में ब्रह्मचारी के रूप में शिक्षा दी जानी चाहिए जिससे वह यह समझ सके कि स्त्री ही इस संसार की वास्तविक बन्धक शक्ति है। यदि कोई बद्ध जीवन के बन्धन से मुक्ति चाहता है, तो उसे स्त्री के आकर्षण से मुक्त होना चाहिए। जीवात्माओं के लिए स्त्री ही सम्मोहक तत्त्व है, किन्तु नर-रूप विशेष रूप से मनुष्य जीवन में तो आत्म-साक्षात्कार के लिए है। सारा संसार स्त्री- आकर्षण के जादू से गतिशील है और मनुष्य स्त्री से जुड़ा नहीं कि वह भव-बन्धन की कठोर ग्रन्थि से जकड़ जाता है। स्त्री के साथ जुड़ाव हो जाने पर स्वामित्व की झूठी प्रतिष्ठा के नशे के अन्तर्गत भौतिक जगत पर अपना प्रभुत्व जताने की लालसा उत्पन्न होती है। घर, भूमि तथा सन्तान प्राप्त करने, समाज में महत्त्वपूर्ण बनने, जाति तथा जन्मभूमि के लिए प्रेम, धन के लिए लोलुपता ये सब जो मायाजाल अथवा स्वप्न के तुल्य हैं, मनुष्य को घेर लेते हैं और मनुष्य अपने जीवन के असली उद्देश्य को भूल जाता है और आत्म-साक्षात्कार की दिशा में उसकी प्रगति अवरुद्ध हो जाती है। ब्रह्मचारी जो प्राय: उच्चजाति का अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य जाति का बालक होता है, प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में पाँच वर्ष की अवस्था से पच्चीस वर्ष की अवस्था तक शिक्षा प्राप्त करता है और जीवन के मूल्यों तथा जीविका के लिए विशिष्ट शिक्षण प्राप्त करने का अनुभव प्राप्त करता है। तत्पश्चात् ब्रह्मचारी को घर जाने दिया जाता है, जहाँ वह गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के लिए किसी अनुकूल स्त्री के साथ विवाह करता है। किन्तु ऐसे अनेक ब्रह्मचारी हैं, जो गृहस्थ बनने के लिए घर नहीं जाते किन्तु वे स्त्रियों से किसी प्रकार का सम्पर्क न करके नैष्ठिक ब्रह्मचारी का जीवन बिताते हैं। वे संन्यास आश्रम स्वीकार करते हैं। वे यह भलीभाँति जानते हैं कि स्त्री की संगति एक झंझट है, जिससे आत्म-साक्षात्कार में बाधा पड़ती है। चूँकि आयु विशेष में कामेच्छा अत्यन्त प्रबल हो उठती है इसलिए गुरु ब्रह्मचारी को विवाह करने की अनुमति दे सकता है; यह छूट केवल उन्हें दी जाती है, जो नैष्ठिक ब्रह्मचारी नहीं रह सकते। और ऐसा भेद करपाना प्रामाणिक गुरु के लिए ही सम्भव है, इस प्रकार तथाकथित परिवार नियोजन का कार्यक्रम आवश्यक है। जो गृहस्थ ब्रह्मचर्य की सम्यक शिक्षा के बाद शास्त्रानुमोदित रीति से स्त्री की संगति करता है, वह गृहस्थ कुत्ते-बिल्लियों की तरह का नहीं होता। ऐसा गृहस्थ पचास वर्ष की आयु के पश्चात् स्त्री की संगति त्याग कर वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करके स्त्री के बिना रहने का अभ्यास करता है। जब अभ्यास पूरा हो जाता है, तो वानप्रस्थी संन्यास ग्रहण करता है तथा स्त्री से, यहाँ तक कि अपनी विवाहिता पत्नी से भी, अपने को अलग कर लेता है। स्त्री से वियुक्त होने की पूरी योजना के अध्ययन से प्रतीत होता है कि आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में स्त्री बाधक है और भगवान् नारायण रूप में स्त्री से वियुक्त होने की शिक्षा देने के लिए ही प्रकट हुए। दृढ़ ब्रह्मचारी के तपस्वी जीवन से ईर्ष्यालु होकर उसका व्रत भंग करने के उद्देश्य से देवता काम देव के सैनिकों को भेजते हैं। किन्तु भगवान् के समक्ष उनकी एक भी नहीं चली, क्योंकि जब दैवी सुन्दरियों ने देखा कि उनकी योगमाया से असंख्य सुन्दरियाँ प्रकट हो सकती हैं और उन्हें बाह्य रूप से आकृष्ट होने की आवश्यकता नहीं है। आम कहावत है कि हलवाई कभी मिठाइयों से ललचाता नहीं। हलवाई जो सदा ही मिठाइयाँ बनाता है, उन्हें खाने की कोई इच्छा नहीं रखता; इसी प्रकार भगवान् अपनी ह्लादिनी शक्ति से असंख्य दैवी सुन्दरियाँ उत्पन्न कर सकते हैं, अत: वे भौतिक संसार की छद्म सुन्दरियों से लेशमात्र भी आकृष्ट नहीं होते। जो यह नहीं जानता, वह मूर्खतावश दोष देता है कि भगवान् श्रीकृष्ण ने वृन्दावन की रास लीला में स्त्रियों के साथ या कि द्वारका में अपनी सोलह हजार पत्नियों के साथ रमण किया।
 
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