श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक
यद्वेनमुत्पथगतं द्विजवाक्यवज्र-
निष्प्लुष्टपौरुषभगं निरये पतन्तम् ।
त्रात्वार्थितो जगति पुत्रपदं च लेभे
दुग्धा वसूनि वसुधा सकलानि येन ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जब; वेनम्—राजा वेन को; उत्पथ-गतम्—पथभ्रष्ट; द्विज—ब्राह्मणों के; वाक्य—शाप के वचन; वज्र—वज्र; निष्प्लुष्ट—भस्म किया जाकर; पौरुष—महान् कार्य; भगम्—ऐश्वर्य; निरये—नरक में; पतन्तम्—गिरते हुए; त्रात्वा—उद्धार करके; अर्थित:—प्रार्थित; जगति—संसार में; पुत्र-पदम्—पुत्र का स्थान; च—भी; लेभे—प्राप्त किया; दुग्धा—दोहन किया; वसूनि—उपज; वसुधा—पृथ्वी; सकलानि—सभी प्रकार की; येन—जिसके द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 महाराज वेन कुमार्गगामी हो गया, अत: ब्राह्मणों ने वज्रशाप से उसे दण्डित किया। इस प्रकार राजा वेन अपने सत्कर्मों तथा ऐश्वर्य के सहित भस्म हो गया और नरक के पथ पर जाने लगा। किन्तु भगवान् ने, अपनी अहैतुकी कृपा से, उसके पुत्र पृथु के रूप में जन्म लेकर शापित राजा वेन को नरक से उबारा और पृथ्वी का दोहन करके उससे सभी प्रकार की उपजें प्राप्त कीं।
 
तात्पर्य
 वर्णाश्रम धर्म-पद्धति के अनुसार पवित्र तथा विद्वान ब्राह्मण समाज के स्वाभाविक संरक्षक होते थे। ब्राह्मणजन प्रशासकों-राजाओं को अपने विद्वत्तापूर्ण प्रेम से अनुदेश देते थे कि किस प्रकार पूर्ण सत्यनिष्ठा से देश का शासन सँभाला जाय। इस प्रकार पूर्ण कल्याणकारी राज्य के रुप में यह प्रक्रिया चलती थी। राजा अथवा क्षत्रिय प्रशासक सदैव विद्वान ब्राह्मणों की परिषद से सलाह लेते थे। वे कभी भी तानाशाह नहीं होते थे। प्रजा पर शासन करने के लिए मनुसंहिता तथा महान् मुनियों द्वारा लिखित अन्य प्रामाणिक कृतियाँ निर्देशक नियम प्रदान करने वाली होती थीं। अल्पबुद्धि वाले मनुष्यों को प्रजातन्त्र के नाम पर विधि संहिता बनाने की कोई आवश्यकता नहीं होती थी। जिस प्रकार शिशु को अपने भावी कल्याण का कोई ज्ञान नहीं होता, उसी प्रकार अल्पबुद्धि मनुष्यों को अपने ही कल्याण के विषय में बहुत कम ज्ञान होता है। जिस प्रकार अनुभवी पिता अबोध शिशु को उन्नति के पथ की ओर ले जाता है उसी प्रकार शिश-रूप जनता को भी वैसे ही पथ-प्रदर्शन की आवश्यकता होती है। मनुसंहिता तथा अन्य वैदिक साहित्य में मानक कल्याण संहिता पहले से विद्यमान है। विद्वान ब्राह्मण राजा को ज्ञान के इन मानक ग्रन्थों के अनुसार तथा देश-काल की विशेष स्थिति के अनुसार सलाह देते रहते थे। ऐसे ब्राह्मण राजा के वेतनभोगी सेवक नहीं होते थे, फलत: वे धर्मग्रन्थों के नियमों के लिए राजा को आदेश देने का सामर्थ्य रखते थे। यह पद्धति महाराज चन्द्रगुप्त के काल तक भी चली और ब्राह्मण चाणक्य उसका अवैतनिक प्रधानमन्त्री था।

महाराज वेन ने शासन के नियमों का पालन नहीं किया। उसने विद्वान ब्राह्मणों की अवज्ञा की। ये ब्राह्मण अत्यन्त विशाल-हृदय थे और अपने हित की परवाह न करके समस्त प्रजा के पूर्ण कल्याण को ही सर्वोपरि मानते थे। उन्होंने राजा वेन को उसके दुराचरण के लिए दण्डित करना चाहा। अत: उन्होंने भगवान् से प्रार्थना की और राजा को शाप भी दिया।

महापुरुष की अवज्ञा मात्र से दीर्घायु, आज्ञापालन, ख्याति, सत्यता, उच्चलोक जाने का अवसर तथा महापुरुषों के आशीष—ये सभी विनष्ट हो जाते हैं। मनुष्य को चाहिए कि महापुरुषों के पदचिह्नों पर दृढ़ता से चले। निस्सन्देह अपने पूर्व पुण्यों से महाराज वेन राजा बना था, किन्तु जान बूझकर महापुरुषों की अवज्ञा से उसे उपरोक्त सभी गुणों से वंचित होकर दण्डित होना पड़ा। वामन पुराण में महाराज वेन के इतिहास तथा उसके पतन का पूर्ण वर्णन मिलता है। जब महाराज पृथु को अपने पिता वेन की इस नारकीय दशा का पता चला कि वे एक म्लेच्छ परिवार में कुष्ट रोगी के रूप में पीडि़त हैं, तो वे शुद्धि के लिए उन्हें तुरन्त कुरुक्षेत्र ले आये और उन्होंने उन्हें समस्त कष्टों से छुटकारा दिलाया।

महाराज पृथु भगवान् के अवतार थे, जो पृथ्वी की अव्यवस्था को दूर करने के लिए ब्राह्मणों की प्रार्थना से अवतरित हुए थे। उन्होंने सभी प्रकार की फसलें उत्पन्न कीं, किन्तु उसके साथ ही एक पुत्र के धर्म का निर्वाह भी किया जो पिता को नारकीय स्थिति से उबारता है। पुत्र का अर्थ है पुत नामक नरक से उद्धार करने वाला। ऐसा ही पुत्र योग्य है।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥