श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 8: राजा परीक्षित द्वारा पूछे गये प्रश्न  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.8.15 
भूपातालककुब्व्योमग्रहनक्षत्रभूभृताम् ।
सरित्समुद्रद्वीपानां सम्भवश्चैतदोकसाम् ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
भू-पाताल—भूमि के नीचे; ककुप्—स्वर्ग की चारों दिशाएँ; व्योम—आकाश; ग्रह—लोक, ग्रह; नक्षत्र—तारे; भूभृताम्— पर्वतों का; सरित्—नदी; समुद्र—समुद्र; द्वीपानाम्—द्वीपों की; सम्भव:—उत्पत्ति; च—भी; एतत्—उनके; ओकसाम्— निवासियों का ।.
 
अनुवाद
 
 हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, कृपा करके यह भी बताएँ कि ब्रह्माण्ड भर के गोलकों, स्वर्ग की चारों दिशाओं, आकाश, ग्रहों, नक्षत्रों, पर्वतों, नदियों, समुद्रों तथा द्वीपों एवं इन सबके विविध प्रकार के निवासियों की उत्पत्ति किस प्रकार होती है?
 
तात्पर्य
 विभिन्न किस्म के भूभागों इत्यादि के वासी भिन्न प्रकार से स्थित होते हैं और वे सभी मामलों में एकसमान नहीं होते। स्थल के वासी जल या आकाश के वासियों से भिन्न होते हैं। इसी प्रकार विभिन्न ग्रहों तथा आकाश के नक्षत्रों के वासी भी एक दूसरे से भिन्न होते हैं। ईश्वरीय नियम के अनुसार, कोई भी स्थान रिक्त नहीं है, किन्तु एक स्थान के वासी दूसरे से भिन्न होते हैं। यहाँ तक कि मानव समाज में भी जंगलों अथवा मरुस्थलों के वासी, ग्रामों तथा नगरों के वासियों से भिन्न होते हैं। ऐसे वे प्रकृति के विभिन्न गुणों के अनुसार निर्मित होते हैं। प्रकृति के नियमों का यह समंजन अंधाधुंध नहीं होता। इस व्यवस्था के पीछे विशाल आयोजन होता है। महाराज परीक्षित इन सब बातों को प्रामाणिक रीति से महामुनि श्रील शुकदेव गोस्वामी से जानने की प्रार्थना करते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥